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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 97, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 97, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

बाह्यमेवास्ति नास्त्यन्यदित्यन्ये सत्यवादिनः । स्वात्मन्यक्षगणातीतं प्राप्नुवन्ति न ते यतः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी तरह जो दूसरे वादी यानी चार्वाक हैं, वे कहते हैं कि पृथ्वी आदि चार भूतों का ही यह जगत्‌ है, दुसरा आत्मरूप नहीं है, यह भी उनका कथन सत्य है-वे भी सत्यवादी ही हैं, क्योकि वे अपनी देह में चक्षु आदि इन्द्रियो से अगम्य आत्मा को, विमर्श करते हुए भी, देख नहीं पाते हैं या जान नहीं पाते हैं