Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
रोधयन्त्यागतं क्षोभं भूकम्पमिव पर्वताः ।
उत्साहयन्ति विपदि सुखयन्ति च संपदि ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
भार्या के सदृश अनेक गुणों से पूर्ण शान्तआकृति ज्ञानी पुरुष विपत्तियों में उत्साह देते हैं और
सम्पत्तियां मे सुख पहुँचाते हे