Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
विना सत्सङ्गमन्येन पोतकेन न तीर्यते ।
आस्तां किं मे विचारेण यद्भवेदस्तु तन्मम ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हमको आत्मा या सत्पुरुष के सम्बन्ध में विचार करने से क्या,
प्रारबधवश जो भी कुछ समय पर हो जायेगा, वह मेरे लिए अच्छा ही होगा-यों भीतर प्रमाद करके
गड मे पड़ हुए कीट के सदृश कभी भी पुरुष को नहीं बैठे रहना चाहिए