Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

यथा दृष्टं तथा मन्ये याति साधुरसाधुताम् । एष सोऽत्यन्त उत्पातो यः साधुर्याति दुष्टताम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

भले ही ऐसा हो, उससे भी क्या दोष हुआ 2 इस पर कहते हैं / यह जगत्‌ का अनिष्टकर महान्‌ उत्पात है, जो कि साधु पुरुष असाधु बन जाता है और यही देश-कालवश जनता के दुरदृष्टों के कारण महोत्पातरूप से भी दिखाई देता है, जैसे कि विश्वामित्र की लुब्ध (लोभी) अमात्यो के समर्थन से वसिष्ठजी की कामधेनु के हरण में प्रवृत्ति हुई और इससे परस्पर वैर की वृद्धि से जगत्‌ मेँ महान्‌ अनिष्ट हुआ, यों अनेक दृष्टान्त देखे जाते हैं