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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

स्थूलदोषं त्वनिर्वाणं शनैः परिहरेत्क्रमात् । याति रम्यमरम्यत्वं स्थिरमस्थिरतामपि ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व परिजनों का त्याग न करने पर कौन दोष उपस्थित होते हैं; उन्हें बतलाते हैं। उनका परिहार न करने पर शोधित भी चित्त अरम्य बन जाता है यानी रागादि से कलुषित बन जाता है, स्थिर भी विश्रान्ति सुख विच्छिन्न हो जाता है, साधु असाधु बन जाता है, क्योकि लोक में जो देखा जाता है, उसे ही हम मानते हैं, यानी लोक में इस प्रकार दोष परिजनों के अपरिहार में देखे जाते हैं