Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
यथासंभवसत्सङ्गशास्त्रैः प्राग्धियमेधयेत् ।
दोषलेशमनादृत्य नित्यं सेवेत सज्जनम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि दोष का कुछ लेश होवे, तो उसको न देख कर सज्जन की नित्य सेवा करनी
चाहिए ओर स्थूल दोषवाले पहले के परिजनों का क्रमशः त्याग करना चाहिए