Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
न नास्तिक्यान्न चास्तिक्यात्कष्टानुष्ठानवैदिकाः ।
मनोज्ञमधुराचाराः प्रियपेशलवादिनः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीर को अधिक कलेश पहुँचाने काले पारलोकिक वैदिक कर्मों में भी शुष्क वैदिक के सदश हठ
से प्रवृत्त होकर क्लेशदुक्त नहीं होते, यह कहते हैं ।
आस्तिक्य भावना या नास्तिक्य भावना से जनित अभिमानप्रयुक्त हठ से न कष्ट कारक
वैदिक अनुष्ठान में निरत रहते हैं। उनका आचरण मनोज्ञ एवं अत्यन्त मधुर होता है और प्रिय एवं
कोमल वार्ता करते हैं