Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 98, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सङ्गादाह्लादयन्त्यन्तः शशाङ्ककिरणा इव ।
विवेचितारः कार्याणां निर्णेतारः क्षणादपि ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ लोग अपने संग से चन्द्रकिरणों के सदुश अन्तःकरण को उल्लास
युक्त बना देते हैं करने योग्य लौकिक एवं वैदिक कर्मों का जब परस्पर विरोध उपस्थित हो जाता
है, तब अकार्यों से विवेक कर एक क्षण में ही सन्देह मिटा देते हैं