Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अस्माकमिव संसारस्तिरश्चां सुखदुःखदः ।
पदार्थप्रविभागेन केवलं ते विवर्जिताः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मनुष्य
जाति के जीवों को संसार सुख-दुःख देनेवाला है, वैसे ही तिर्यग्योनि पशुओं को भी है। केवल भेद
इतना है कि उत्कर्ष-अपकर्ष बुद्धि के कारण गुण-क्रिया विभाग वे नहीं जानते