Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
हृदयात्सुखदुःखाभ्यां नासातो रशनागुणैः ।
पशवः परिकृष्यन्ते विक्रीताः पामरा अपि ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
बेचे गये मनुष्य की समानता पशु में बतलाते हैं
बैल आदि पशु, जो नाथे जाते हैं, मन से भीतर भीतर सुख दुःख से खींचे जाते हैं और बाहर
से नाथ रज्जु के द्वारा नासिका प्रदेश से खींचे जाते हैं यों दोनों ओर पराधीनता से खींचे जा रहे भी
वे कुछ भी अपना दुःख हरने या प्रकट करने में समर्थ नहीं होते, ठीक इसी तरह के द्वीपान्तर में बेचे
गये पामर जन (गुलाम) भी होते हैं, इस लिए दोनों की समता है ही