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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

यथोर्मिणोर्मौ निहते न काचित्पयसां क्षतिः । तथा देहेन निहते देहे नास्ति चितेः क्षतिः ॥ ३५ ॥ चितावाकाश एवाहं देह इत्युपजायते । संविदेव ततो देहे नष्टे किं नाम नश्यति ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी स्थिति में मिथ्या देह आदि के निथ्या शत्रुओं द्वारा नष्ट किये जाने पर भी उन दोनो के अधिष्ठानरुप आत्मा का कुछ भी नहीं बिगड़, यह कहते है / जैसे एक लहर के आघात से दूसरी लहर के छिन्‍न-भिन्‍न होने पर जल की कुछ हानि नहीं होती है। वैसे ही एक देह से दूसरी देह के नष्ट होने पर चित्‌ की भी क्षति नहीं होती है