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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

प्रबुद्धस्यैव चिद्व्योम्नः स्वप्नो जगदिति स्थितम् । पृथ्व्यादिरहितं यस्मात्तस्मात्स्वप्नात्मकं जगत् ॥ ३७ ॥ सर्गादौ पूर्वचित्स्वप्नाज्जाता पृथ्व्यादिवस्तुधीः । स्वप्नार्थे सत्यताभ्रान्तिः कल्पनामात्ररूपिणी ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाशरूप चित्‌ में ही देह ऐसा भ्रमात्मक ज्ञान ही पैदा होता है ऐसी अवस्था में भ्रमात्मक ज्ञानरूप देह के नष्ट होने पर क्या नष्ट हुआ ? ॥३ ६॥ ज्ञानघन चिदाकाश ही स्वप्न जगत्रूप से प्रसिद्ध है । चूँकि यह जगत्‌ स्वप्न-जगत्‌ के समान पृथिवी आदि से शून्य है, इसलिए स्वप्नरूप है