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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

भूतानामणुमात्राणामप्यस्माकमिवैषणाः । किंत्वल्पास्था वयं विघ्नास्तेषां त्वचलसंनिभाः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

रहती हैं, परन्तु हम लोगों को उन भोगों में एक तो आस्था नहीं है और उनको प्राप्त करने में कोई अधिक विघ्नवाधा भी नहीं पहुँचाता, उनको तो मोह, काम आदि दोषों की अधिकता के कारण तथा विवेक की मात्रा के अभाव से उन भोगों में अधिक आस्था है और उनको पाने में उन्हें पर्वत के सदृश बड़े बड़े विघ्नों का सामना भी करना पड़ता है