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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

यथा विराट् प्रयतते बालखिल्यास्तथैव खे । बालमुष्ट्यल्पकायेऽपि पश्याहंकृतिजृम्भितम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि प्रश्न हो कि भोगो में बहुत आस्था है, यह आपने केसे जाना, तो इसका उत्तर है-प्रयत्न की अधिकता, इस आशय से कहते हैं । भद्र, जिसका समस्त ब्रह्माण्ड एक शरीर है, वह विराट्‌ हिरण्यगर्भ जैसे अपने अधिकार निभाने की अनेक चेष्टाओं के द्वारा स्वभोगार्थ प्रयत्न करता है, वैसे ही केशों के अग्रभाग के सदुश देहवाले कृमि, कीट आदि भी बालक की मुट्ठी के छेद की अपेक्षा भी छोटे अल्पकाय आकाश में प्रयत्न करते हैं, देखिये तो सही कि कैसी अहंकार की महिमा है