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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

वस्तुतस्तु यथाभूतं चिद्बब्रह्मैवाततं स्थितम् । न च तत्संस्थितं किंचित्स्मर्ताऽस्मर्ता किमात्मकः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

असत्यस्वरूप जयत्‌भ्रान्ति को मूढो ने अपनी कयोलकल्यना से सच छी मान लिया हैं. यों इव से सत्य सरे उपमित कर उपमा द्वारा भ्रान्तिकल्पना में सत्यार्थ कल्यना की समानता दिखलाई/ वह तभी सम्भव हो सकती हैं जब पहले सत्य पदार्थ रहे हों. उनका अनुभव भी हुआ हो और इस समय उनका स्मरणकर्ता भी हो / दूसरी हालत में यह सभव नहीं है, ऐसा कहते हैं / वास्तव में अपने स्वरूप से अच्युत सच्चिदानन्दरूप सर्वव्यापक ब्रह्म ही स्थित है । सत्यतारूप पृथ्वी आदि कुछ भी पहले कभी नहीं रहा । ऐसी परिस्थिति में जब उसके अनुभव की सर्वथा असिद्धि है तब उसका स्मरण करनेवाला या विस्मरण करनेवाला भला कौन होगा ?