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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 99, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 99, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

मूर्खस्य यादृशमिदं तु तदज्ञ एव जानात्यसौ न हि वयं किल तत्र तज्ज्ञाः । मत्स्यो हि यो मृगनदीसलिले स एव जानाति तच्चपलवीचिविवर्तनानि ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

तब मूर्ख को मरण और जन्म में करयो कर दुःख प्राप्त होता है 2 ऐसा यदि कड प्रश्न करे तो उसके प्रति उत दुःखप्राप्ति का मूर्ख को ही अनुभव होता हैं ऐसा कहते हैं / मूर्ख को जिस प्रकार का दुःख होता है उसे मूर्ख ही जानता है, वह हम लोगों की जानकारी के बाहर की बात है । देखिये न, जिसे मृगतृष्णारूपी नदी के जल में “मेँ मछली हूँ” यों अपनी मछलीरूपता का अनुभव होता है, वही तो उसकी (मृगतृष्णारूपी नदी की) चंचल लहरों का लहराना जानेगा, किन्तु जिसे मृगतृष्णा नदी की भ्रान्ति नहीं है, वह कैसे जानेगा ?