एक साधक एक बार संत के पास गया और बोला — "महाराज, मैं वर्षों से भक्ति कर रहा हूँ, शास्त्र पढ़ रहा हूँ — पर लगता है जैसे आगे नहीं बढ़ रहा। कोई अदृश्य दीवार है जो रोक रही है।"
संत मुस्कुराए और बोले — "दीवार अदृश्य नहीं है। बस तुम उसे दीवार नहीं मान रहे — उसे 'मैं' कह रहे हो।"
यही है भक्ति और ज्ञान के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा — "मैं।" और इसके साथ हैं — माया, अहंकार, आसक्ति, वासनाएं। शास्त्रों ने इन सबका बहुत विस्तार से वर्णन किया है — और निवारण भी बताया है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भागवत — माया और अविद्या — सबसे पहली और सबसे गहरी बाधा
भगवन्! जब जीव माया से मोहित होकर अविद्या को अपना लेता है, उस समय उसके स्वरूपभूत आनंदादि गुण ढक जाते हैं। वह गुणजन्य वृत्तियों, इंद्रियों और देहों में फंस जाता है तथा उन्हीं को अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, वेदस्तुति
यह श्लोक बहुत महत्त्वपूर्ण बात कह रहा है — "उन्हीं को अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है।" यानी शरीर "मेरा" नहीं — पर हम उसे "मैं" मान बैठते हैं। मन "मैं" नहीं — पर हम उसे "मैं" मान बैठते हैं।
और जब यह भ्रम हो जाए — तो भक्ति हो कैसे? जब "मैं" ही गलत पहचाना गया हो, तो "मेरी भक्ति" भी उसी गलत "मैं" की भक्ति बन जाती है। यही माया की सबसे बड़ी चाल है।
२. श्रीमद्भागवत — माया त्रिगुणों का प्रदर्शन करती है
आपकी यह माया आपकी दृष्टि के आंगन में आकर नाच रही है और काल, स्वभाव आदि के द्वारा सत्त्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी अनेकानेक भावों का प्रदर्शन कर रही है।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, वेदस्तुति
"माया नाच रही है" — यह बहुत सटीक उपमा है। एक नर्तकी जब नाचती है — दर्शक उसी में खो जाते हैं। माया भी ऐसे ही नाचती है — और हम देखते रह जाते हैं, भूल जाते हैं कि यह नाच है।
त्रिगुण — सत्त्व, रजस, तमस — यह तीनों माया के नृत्य के तीन भाव हैं। सत्त्व में ज्ञान का अभिमान आता है। रजस में क्रोध और महत्त्वाकांक्षा। तमस में आलस्य और भ्रम। तीनों बाधाएं हैं — और तीनों माया के खेल हैं।
३. श्री योगवासिष्ठ — आसक्ति — कर्मेंद्रिय और बुद्धि का जाल
कर्मेंद्रिय, बुद्धीन्द्रिय आदि का नाश तथा सुख, दुःख आदि का क्षय होने पर "तत्", "सत्" इत्यादि नामों से शिवस्वरूप आत्मा ही कहा गया है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ४१
योगवासिष्ठ यहाँ एक उल्टी बात कह रहा है — आत्मा तब दिखती है जब इंद्रियों और सुख-दुःख का "नाश" हो। यानी जब तक इंद्रियाँ सक्रिय हैं और सुख-दुःख का अनुभव हो रहा है — आत्मा उनके पीछे छिपी रहती है।
यह बाधा बहुत गहरी है — क्योंकि हम सुख को बुरा नहीं मानते। पर शास्त्र कह रहे हैं — सुख की आसक्ति भी बाधा है। जब तक "यह सुख मुझे मिले" की इच्छा है — आत्मज्ञान दूर है।
४. श्रीमद्भागवत — इंद्र का अहंकार — जब "मैं" साधना में भी घुस जाए
इंद्र ने अपनी रक्षा के लिये कपटरूप से पाखंडवेष धारण कर लिया था, जो अधर्म में धर्म का भ्रम उत्पन्न करने वाला है — जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा-सा जान पड़ता है।
श्रीमद्भागवत — चतुर्थ स्कंध, महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ
यह प्रसंग बहुत सोचने वाला है। इंद्र — देवताओं के राजा — ईर्ष्यावश पृथु के यज्ञ में विघ्न डालने गए। और विघ्न कैसे डाला? "पाखंडवेष धारण करके" — यानी धर्म का ढोंग करके।
यह आध्यात्मिक मार्ग की सबसे खतरनाक बाधा है — जब अहंकार स्वयं को धर्म का वेश पहना ले। जब "मैं" साधना में भी घुस जाए और कहे "मेरी भक्ति, मेरा ज्ञान, मेरी साधना" — तब विघ्न भीतर से ही शुरू हो जाता है।
५. श्रीमद्भागवत — पृथ्वी की भूख — वासनाओं की व्याकुलता
पृथ्वी को भूख-प्यास सताने लगी थी, जिसके कारण उसने अन्याय किया।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, भगवान् द्वारा पृथ्वी को आश्वासन
यह एक रूपक है — पर बहुत गहरा। पृथ्वी भूखी थी — और भूख में अन्याय हो गया। वासनाएं ऐसी ही होती हैं — जब वे तीव्र हों तो विवेक खो जाता है। और विवेक खोने पर साधना भटक जाती है।
इंद्रिय-जन्य वासनाएं — भोजन की, सुख की, मान-सम्मान की — ये सब जब तीव्र हों, तो भक्ति और ज्ञान की गहराई में जाना कठिन हो जाता है। पृथ्वी की कथा यही याद दिलाती है।
६. श्री योगवासिष्ठ — माया का नृत्य — सत्य को असत्य दिखाना
जैसे कुहरे से आच्छादित वस्तु का स्वरूपतः ज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होता है, वैसे ही नीहार के सदृश स्वरूप-आच्छादन करने वाले अज्ञान से आवृत आत्मा का भी स्वरूपतः ज्ञान न होकर जो विपरीत अवलोकन है — वही जीव का स्वरूप है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग २
"कुहरे में लिपटी वस्तु" — यह उपमा बहुत सुंदर है। कुहरे में सूरज दिखता नहीं — पर होता है। कुहरे में पेड़ धुंधले दिखते हैं — पर हैं। ऐसे ही अज्ञान के कुहरे में आत्मा दिखती नहीं — पर है।
और "विपरीत ज्ञान" — यानी जो नहीं है, वह दिखता है। शरीर को "मैं" समझना — यह विपरीत ज्ञान है। संसार को सत्य समझना — यह विपरीत ज्ञान है। यही बाधा का असली स्वरूप है।
७. निवारण — स्कंद पुराण — धर्म से ही सुख, धर्म ही निवारण
सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिए कि वह जैसे अपने-आपको सुखी देखना चाहता है, उसी प्रकार दूसरे को भी देखे। सुख धर्म से ही प्राप्त होता है। अतः चारों वर्णों के मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने धर्म का पालन करना चाहिए।
स्कंद महापुराण — ब्रह्म खंड, धर्मारण्य-माहात्म्य, अध्याय ९५
निवारण का पहला सूत्र — "दूसरे को भी वैसा देखो जैसा खुद को देखते हो।" यह एक बहुत व्यावहारिक उपाय है। जब हम दूसरों में भी अपना सुख-दुःख देखने लगते हैं — तब अहंकार और आसक्ति दोनों कम होते हैं। क्योंकि "मैं" और "दूसरा" का भेद मिटने लगता है।
और धर्म-पालन — अपना कर्तव्य निभाना — यह भी एक बड़ा निवारण है। जो अपना धर्म ईमानदारी से निभाता है, उसके मन में संघर्ष कम होता है। और जब संघर्ष कम हो — साधना गहरी होती है।
समग्र समझ
भक्ति और ज्ञान के मार्ग में बाधाएं बाहर से नहीं आतीं — भीतर से आती हैं। माया हमें भ्रमित करती है, अहंकार हमें रोकता है, आसक्ति हमें बाँधती है, वासनाएं हमें भटकाती हैं, और त्रिगुण हमें उलझाते हैं।
और निवारण भी भीतर से है। सत्संग — जो अज्ञान का कुहरा हटाए। विवेक — जो सत्य-असत्य का भेद दिखाए। वैराग्य — जो पकड़ ढीली करे। शरणागति — जो "मैं" को परमात्मा में विलीन करे। और धर्म-पालन — जो जीवन को एक ठोस आधार दे।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| माया | सत्य को असत्य दिखाने वाली शक्ति | Illusion — makes the unreal appear real |
| अविद्या | आत्म-ज्ञान का अभाव | Ignorance — absence of self-knowledge |
| त्रिगुण | सत्त्व, रजस्, तमस् — प्रकृति के तीन गुण | Three qualities of nature — Sattva, Rajas, Tamas |
| अहंकार | "मैं" और "मेरा" का भ्रामक बोध | Ego — false identification with "I" and "mine" |
| वासना | तीव्र इच्छा, अभिलाषा | Deep-rooted desire and craving |
| विवेक | सत्य-असत्य का विवेचन | Discrimination between real and unreal |
| शरणागति | ईश्वर में पूर्ण समर्पण | Complete surrender to God |
जीवन में उपयोग
बाधाओं को पहचानने का एक सरल तरीका — जब भी साधना में मन न लगे, रुककर पूछें: "अभी कौन सी बाधा है?" माया है? — तो शास्त्र सुनें। अहंकार है? — तो किसी की सेवा करें। आसक्ति है? — तो किसी प्रिय चीज़ को एक दिन के लिए छोड़कर देखें। वासना है? — तो उसे ईश्वर को अर्पित करें।
और निवारण का सबसे सरल सूत्र — जो संत ने कहा था — "दीवार 'मैं' है।" रोज़ थोड़ा-थोड़ा यह "मैं" हल्का होने दें। बाधाएं अपने आप कम होती जाएंगी।
Sources
- Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / वेदस्तुति
- Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / भगवान् द्वारा पृथ्वी को आश्वासन
- Shrimad Bhagwat Puran — Chaturth Skandh / महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ
- Shrimad Bhagwat Puran — Navam Skandh / भगवान् श्रीराम की लीलाओं का वर्णन
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध / सर्ग ४१
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण / सर्ग २
- Skanda Mahapurana — Brahma Khanda, Dharmaranya Mahatmya / Chapter 95
