एक बार तीन मित्र एक ही काम करने बैठे — एक किताब पढ़ना। पहले ने किताब उठाई, दस मिनट पढ़ी, फिर सो गया। दूसरे ने किताब उठाई, पढ़ते-पढ़ते मन में आया — "यह ज्ञान बेचकर पैसे कमाए जा सकते हैं" — और योजनाएं बनाने लगा। तीसरे ने किताब उठाई, शांत मन से पढ़ी, और भीतर कुछ बदल गया।
तीनों ने एक ही काम किया — पर तीनों का परिणाम अलग। पहला तमस में था, दूसरा रजस में, तीसरा सत्त्व में।
यही त्रिगुण हैं। और यही तीनों हमारे हर कर्म और हर ज्ञान को रंगते हैं — बिना हमें पता चले।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भगवद्गीता — तीनों गुण क्या करते हैं?
सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में — तथा तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४, गुणत्रय विभाग योग
एक ही श्लोक में तीनों गुणों का काम बता दिया गया। सत्त्व — सुख और शांति। रजस — कर्म और उत्साह। तमस — ज्ञान को ढकना और प्रमाद।
पर ध्यान दें — यहाँ "सुख" और "कर्म" भी बंधन हैं। सत्त्व का सुख भी एक प्रकार का बंधन है — क्योंकि हम उसमें रम जाते हैं। रजस का कर्म भी बंधन है — क्योंकि हम फल में उलझ जाते हैं। तमस सबसे बड़ा बंधन है — क्योंकि वह ज्ञान को ही ढक देता है।
२. श्रीमद्भगवद्गीता — तमस — अज्ञान से जन्मा, प्रमाद में रखता है
सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४
तमस के तीन हथियार हैं — प्रमाद, आलस्य और निद्रा। और ये तीनों इतने आरामदेह हैं कि हम इन्हें बंधन नहीं मानते।
प्रमाद — यानी लापरवाही। "कल करूँगा, परसों देखूँगा।" आलस्य — "अभी नहीं उठना।" निद्रा — "थोड़ा और सो लूँ।" यह तीनों मिलकर जीवन की साधना को रोक देते हैं। और जब साधना रुकती है — ज्ञान भी रुकता है।
३. श्रीमद्भगवद्गीता — रजस — लोभ और अशांति का जनक
रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, सकाम भाव से कर्मों का आरम्भ, अशांति और विषय-भोगों की लालसा — ये सब उत्पन्न होते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४
रजस में ऊर्जा होती है — पर वह ऊर्जा "पाने" की दिशा में होती है। लोभ, कर्मों में अशांत व्यस्तता, भोगों की लालसा — यह सब रजस के लक्षण हैं।
आज के समय में सबसे अधिक रजस दिखता है। सब कुछ तेज़, ज़्यादा, अभी — यह रजस की भाषा है। और इसमें काम तो होता है — पर शांति नहीं मिलती। क्योंकि रजस की थकान में भी "और काम" की इच्छा रहती है।
४. श्रीमद्भगवद्गीता — सत्त्व — ज्ञान और विवेक का प्रकाश
जिस समय इस देह में तथा अंतःकरण और इंद्रियों में प्रकाश और विवेक-शक्ति उत्पन्न होती है — उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४
"प्रकाश और विवेक-शक्ति" — यह सत्त्व के लक्षण हैं। जब सुबह उठकर मन शांत हो, विचार स्पष्ट हों, किसी के प्रति द्वेष न हो, काम में मन लगे — यह सत्त्व है।
सत्त्व में ज्ञान आता है। पर ध्यान रखें — सत्त्व भी अंतिम अवस्था नहीं, यह मोक्ष नहीं है। सत्त्व का सुख और ज्ञान का अभिमान — यह भी एक सूक्ष्म बंधन है। इसीलिए गीता तीनों गुणों से परे जाने की बात करती है।
५. श्रीमद्भागवत — आत्मा गुणों से परे है — अहंकार ही फँसाता है
जैसे वायु आकाश को सुखा नहीं सकती, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता — वैसे ही सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की वृत्तियाँ अविनाशी आत्मा का स्पर्श नहीं कर पातीं। इनके द्वारा तो केवल वही संसार में भटकता है, जो इनमें अहंकार कर बैठता है।
श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, परमार्थ-निरूपण
यह भागवत की सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। आत्मा वास्तव में गुणों से प्रभावित नहीं होती — वह आकाश जैसी है। पर जब हम "मैं रजस में हूँ, मैं तमस में हूँ" — यह अहंकार करते हैं — तब हम बँध जाते हैं।
यानी गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं। जो गलती हम करते हैं वह यह — प्रकृति के गुणों को "मैं" मान लेते हैं। "मैं आलसी हूँ, मैं लोभी हूँ" — यह अहंकार ही बंधन है। जिस दिन यह पता चले कि "मैं" तो गुणों से परे हूँ — उस दिन मुक्ति की शुरुआत होती है।
६. श्रीमद्भागवत — भक्तियोग — रजोगुण के मल को धोता है
उद्धवजी! तब तक इन मायानिर्मित गुणों और उनके कार्यों का संग सर्वथा त्याग देना चाहिए — जब तक मेरे सुदृढ़ भक्तियोग के द्वारा मन का रजोगुणरूप मल एकदम निकल न जाए।
श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध
यहाँ भगवान् कह रहे हैं — रजोगुण एक "मल" है — मन का मैल। और इसे धोने का उपाय — "सुदृढ़ भक्तियोग।" भक्ति मन को साफ करती है — जैसे साबुन कपड़े को।
और जब रजोगुण का मैल साफ होता है — तो सत्त्व उभरता है। और जब सत्त्व उभरता है — ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्ति इसीलिए ज्ञान-प्राप्ति का सबसे प्रभावी साधन है।
७. श्रीमद्भागवत — भगवान् की उपस्थिति — सभी गुण-दोष नष्ट
जब पुरुषोत्तम भगवान् हृदय में आ विराजते हैं — तब उनकी सन्निधिमात्र से ही सब-के-सब दोष नष्ट हो जाते हैं। जैसे सोने के साथ संयुक्त होकर अग्नि उसके मलिनता आदि दोषों को नष्ट कर देती है — वैसे ही भगवान् विष्णु साधकों के अशुभ संस्कारों को मिटा देते हैं।
श्रीमद्भागवत — द्वादश स्कंध
सोना — जब आग में तपता है, तो मैल निकलती है और सोना शुद्ध होता है। यह उपमा बहुत सटीक है। हम सब मूल रूप से शुद्ध हैं — गुणों का मैल चढ़ा हुआ है। भगवान् की भक्ति वह अग्नि है जो यह मैल जलाती है।
और जब मैल जल जाए — जो बचता है वह शुद्ध ज्ञान है। गुण-दोष नहीं, केवल परम सत्य।
८. श्री योगवासिष्ठ — मोह पर विजय — आत्मचिंतन का अमृत
जैसे चंद्रमा अपने अमृत से भीतर शीतलता को प्राप्त करता है — वैसे ही मोह का अतिक्रमण कर लेने वाला पुरुष निरंतर आत्मचिंतनरूपी अमृत से अपने भीतर शीतलता को प्राप्त करता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ६४
मोह — यानी तमस का सबसे गहरा रूप। और उससे निकलने का रास्ता — "आत्मचिंतन"। जब हम रुककर पूछते हैं "मैं कौन हूँ?" — तब तमस का मोह कम होता है।
और परिणाम? "शीतलता।" जैसे चंद्रमा की शीतलता — बिना प्रयास के, बिना कोशिश के — भीतर से आती है। यही निदिध्यासन का स्वाभाविक फल है — एक गहरी, स्थायी शांति।
९. श्रीमद्भगवद्गीता — गुणों से परे — भक्तियोग से ब्रह्मभाव
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मुझको निरंतर भजता है — वह इन तीनों गुणों को भली-भाँति लाँघकर सच्चिदानंदघन ब्रह्म को प्राप्त होने के योग्य बन जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४
यह गीता का सबसे महत्त्वपूर्ण उत्तर है — गुणों से परे कैसे जाएं? "अव्यभिचारी भक्तियोग।" यानी बिना किसी दूसरी चाहत के, केवल भगवान् की भक्ति।
और परिणाम? "सच्चिदानंदघन ब्रह्म।" जहाँ न सत्त्व का सुख है, न रजस की बेचैनी, न तमस का अज्ञान — बस शुद्ध आनंद। यही गुणातीत अवस्था है। और यही ज्ञान का अंतिम लक्ष्य।
जीवन में उपयोग
आज से एक सरल अभ्यास — दिन में तीन बार खुद से पूछें: "अभी मैं किस गुण में हूँ?" सुबह उठते हुए शांत और स्पष्ट हैं — सत्त्व। दोपहर को बेचैन और व्यस्त हैं — रजस। शाम को थके और उदास हैं — तमस।
यह पहचान ही परिवर्तन की शुरुआत है। जब तमस में हों — थोड़ा चलें, पानी पिएं, एक श्लोक पढ़ें। जब रजस में हों — पाँच मिनट चुप बैठें। जब सत्त्व में हों — उस समय शास्त्र पढ़ें, ध्यान करें। और रोज़ याद रखें — "मैं गुण नहीं हूँ।" यही ज्ञान का पहला कदम है।
