श्रवण, मनन और निदिध्यासन की भूमिका मोक्ष प्राप्ति में क्या है?
एक बार एक संगीत विद्यार्थी ने अपने उस्ताद से कहा — "मैंने राग भैरवी के सौ घंटे के लेक्चर सुने हैं, पर जब गाने बैठता हूँ तो कुछ नहीं निकलता।" उस्ताद मुस्कुराए और बोले — "सुनने से राग कानों में उतरता है। सोचने से दिमाग में। गाने से हृदय में। जब तक हृदय में नहीं उतरा — राग आया ही नहीं।"
आध्यात्मिक ज्ञान भी बिल्कुल ऐसा ही है। श्रवण — यानी सुनना — पहली सीढ़ी है। मनन — यानी सोचना और समझना — दूसरी। और निदिध्यासन — यानी उस सत्य को इतना गहरे उतारना कि वह हमारे होने का हिस्सा बन जाए — यही तीसरी और अंतिम सीढ़ी है।
शास्त्र कहते हैं — तीनों के बिना मोक्ष नहीं। आइए देखते हैं क्यों।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भागवत — श्रवण, मनन, निदिध्यासन से आत्मसाक्षात्कार
जिसने उपनिषदादि शास्त्रों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा आत्मसाक्षात्कार कर लिया है — वह यह जानकर कि सम्पूर्ण द्वैत-प्रपंच और इसकी निवृत्ति का साधन वृत्तिज्ञान मायामात्र है, उन्हें मुझमें लीन कर दे।
श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, भक्ति, ज्ञान और यम-नियमादि साधनों का वर्णन
भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उद्धव को एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात बता रहे हैं — आत्मसाक्षात्कार के लिए तीनों एक साथ चाहिए। केवल श्रवण नहीं, केवल मनन नहीं — तीनों मिलकर काम करते हैं।
और जब यह साक्षात्कार हो जाता है — तब व्यक्ति समझता है कि संसार का सारा द्वैत माया है। और उस माया को "लीन" कर देता है — परमात्मा में। यह लीन करना ही मोक्ष है।
२. श्रीमद्भागवत — ज्ञान जो दृढ़ न हो, वह व्यर्थ है
जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान न देने से श्रवण का, संदेह से मनन का और चित्त के इधर-उधर भटकते रहने से जप का भी कोई फल नहीं होता।
श्रीमद्भागवत महात्म्य — धुन्धुकारी को प्रेतयोनि की प्राप्ति और उससे उद्धार
यह श्लोक एक कड़वी सच्चाई कहता है — और यह सच्चाई हम सबको चुभती है। हम कितनी बार प्रवचन सुनते हैं, पर मन कहीं और होता है। कितनी बार जप करते हैं, पर चित्त भटकता रहता है।
शास्त्र कह रहा है — ऐसे श्रवण और जप का कोई फल नहीं। ध्यान चाहिए — पूरा ध्यान। और संदेह हो तो मनन करो, पर संदेह के साथ रुको मत।
३. श्री योगवासिष्ठ — श्रवण, मनन, निदिध्यासन से अविद्या का क्षालन
सत्-शास्त्र, सद्गुरु और सत्संग आदि नामधारी सात्विक — अविद्या के विभागों से सम्पादित श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन से लेकर साक्षात्कारपर्यन्त अपनी वृत्ति-परम्परा से अविद्या का क्षालन करता हुआ चिरकाल तक स्थित रहता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ४१
"अविद्या का क्षालन" — यानी अज्ञान को धोना। जैसे मैले कपड़े को एक बार धोने से पूरी तरह साफ नहीं होता — बार-बार धोना पड़ता है। वैसे ही अविद्या भी एक ही श्रवण से नहीं जाती।
श्रवण पहला धुलाई है। मनन दूसरी। निदिध्यासन तीसरी और गहरी। और "साक्षात्कारपर्यन्त" — यानी जब तक साक्षात्कार न हो — यह प्रक्रिया चलती रहती है।
४. श्री योगवासिष्ठ — मनन-निदिध्यासन से कलना ब्रह्मता को प्राप्त होती है
शास्त्रजन्य ज्ञान से, शम आदि साधनयुक्त मनन और निदिध्यासन से प्रबुद्ध हुई सब लोगों की कलना ब्रह्मता को प्राप्त होती है — अन्यथा संसार में भ्रमण करती है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग १३
"कलना" यानी बुद्धि की वृत्ति — मन की धारा। योगवासिष्ठ कह रहा है — या तो यह धारा मनन-निदिध्यासन से ब्रह्म की ओर बहती है, या संसार में भटकती रहती है। तीसरा कोई विकल्प नहीं।
और "शम आदि साधनयुक्त" — यानी अकेला मनन काफी नहीं, मन की शांति भी चाहिए। बेचैन मन से मनन नहीं होता — वह सिर्फ रजोगुण की उठा-पटक होती है।
५. श्री योगवासिष्ठ — निदिध्यासन से "न दुःख है, न सुख" — शिवमय जगत्
निदिध्यासन से मनन-सहित अभाव शब्दज्ञानकृत बाध दृढ़ता को प्राप्त हो जाता है। न तो दुःख है और न सुख है — किन्तु शांत शिवमय यह जगत् है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ३७
यह एक बहुत बड़ा वाक्य है — "न दुःख है, न सुख।" पर यह वाक्य पढ़ने से नहीं — निदिध्यासन से समझ आता है।
जब तक हम पढ़ते हैं — हम सोचते हैं "ठीक है, यह दार्शनिक बात है।" जब मनन होता है — हम थोड़ा मानने लगते हैं। जब निदिध्यासन होता है — तब एक पल ऐसा आता है जब सच में महसूस होता है कि सुख-दुःख के पीछे कुछ और है — जो सदा शांत है। वही शिव है, वही ब्रह्म है।
६. विवेकचूड़ामणि — श्रवण से सौगुना मनन, मनन से लाखगुना निदिध्यासन
वेदांत के श्रवणमात्र से उसका मनन करना सौगुना अच्छा है और मनन से भी लाखगुना श्रेयस्कर निदिध्यासन है — तथा निदिध्यासन से भी अनंतगुना निर्विकल्प-समाधि का महत्त्व है।
विवेकचूड़ामणि — अधिष्ठान-निरूपण
शंकराचार्य जी ने यहाँ एक सुंदर गणित किया है। श्रवण — १। मनन — १०० (सौगुना)। निदिध्यासन — १,००,०० (लाखगुना)। निर्विकल्प समाधि — अनंत।
यह गणित हमें बताता है — हम अपना ज़्यादातर समय किसमें लगाते हैं? श्रवण में। यानी सबसे कम मूल्य वाले कदम में। जबकि निदिध्यासन — जो लाखगुना श्रेयस्कर है — उसके लिए समय ही नहीं निकाल पाते।
७. श्रीमद्भगवद्गीता — मनन-निदिध्यासन से अव्यय पद की प्राप्ति
निर्माममोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वंद्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १५, पुरुषोत्तम योग
गीता यहाँ मोक्ष के अधिकारी का वर्णन करती है — निर्मम, निर्मोह, जितेंद्रिय, अध्यात्म में नित्य-स्थित, कामनाओं से मुक्त, सुख-दुःख के द्वंद्व से परे। और इन सबका साधन? मनन और निदिध्यासन।
"अध्यात्मनित्या" — यानी जो आत्मचिंतन में सदा लगे रहते हैं। यह आत्मचिंतन ही निदिध्यासन का दूसरा नाम है। और इसका फल? "पदमव्ययं" — वह अव्यय, अनश्वर पद — मोक्ष।
जीवन में उपयोग
आज से एक सरल योजना बनाएँ। हफ्ते में तीन दिन किसी भी शास्त्र का — चाहे भागवत हो, गीता हो या योगवासिष्ठ — थोड़ा श्रवण करें। फिर उसी दिन पाँच मिनट रुककर सोचें — "यह जो सुना, क्या यह सच है? मेरे जीवन में यह कहाँ दिखता है?" यह मनन है।
और फिर — रात सोने से पहले, जब सब शांत हो — उस एक सत्य को मन में पकड़ें। बस उसके साथ रहें। विचार आएँगे, जाने दें। वापस उसी सत्य पर आएँ। दस मिनट। यही निदिध्यासन है — और इसी का गहरा अभ्यास तन्मयता कहलाता है।
यह तीन कदम — सुनना, सोचना, रमना — अगर नियमित हों, तो शास्त्र जो वादा करते हैं — वह दूर नहीं।
