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भागवत पुराण में वर्णित तन्मयता का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?

Nripendra Mishra9 March 2026
सारांश: तन्मयता यानी जब मैं पीछे हट जाए और केवल परमात्मा रहे। गोपियों और मार्कण्डेय मुनि के उदाहरण से जानें तन्मयता का व्यावहारिक अभ्यास।
भागवत पुराण में वर्णित तन्मयता का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?

कभी किसी संगीत को सुनते हुए ऐसा हुआ है कि समय का पता ही न रहे? या किसी किताब में इतने डूब गए हों कि घंटों बाद होश आए? या किसी प्रियजन के साथ बात करते हुए दुनिया भूल गई हो?

वह अनुभव — जब "मैं" थोड़ा पीछे चला जाता है और केवल वह चीज़ रह जाती है जिसमें हम हैं — उसी को शास्त्र "तन्मयता" कहते हैं।

अब सोचिए — अगर यही तन्मयता ईश्वर के साथ हो? जब "मैं" पूरी तरह मिट जाए और केवल परमात्मा रहे — वही मोक्ष है। भागवत पुराण और योगवासिष्ठ इसी तन्मयता को साधने के अलग-अलग रास्ते बताते हैं।

शास्त्रों से ज्ञान

१. भागवत पुराण — मार्कण्डेय मुनि — तन्मयता से सुनना

मार्कण्डेय मुनि ने भगवान् शंकर की कथा को पूरी तन्मयता के साथ सुना। संतजन दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं — यह उनकी तन्मयता और ईश्वर से एकाकारिता का प्रतीक है।

श्रीमद्भागवत — द्वादश स्कंध, मार्कण्डेयजी को भगवान् शंकर का वरदान

मार्कण्डेय मुनि सुन रहे थे — पर सामान्य सुनना नहीं। "पूरी तन्मयता के साथ" — यानी कथा सुनते हुए वे खुद कथा में थे। बाहर की दुनिया थी, पर उन्हें दिख नहीं रही थी।

और देखिए परिणाम — "संतजन दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं।" जो इतनी गहरी तन्मयता से ईश्वर में हो — उसका दर्शन भी पावन करता है। यह तन्मयता का फल है।

२. भागवत पुराण — भागवत-धर्म — हर काम ईश्वर को समर्पित

देह, गेह आदि तुच्छ पदार्थों में अहंता और ममता के कारण चित्तवृत्ति उद्विग्न होती है। भागवत-धर्म का सार यह है कि जो कुछ भी शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों से किया जाए — वह सब परमपुरुष भगवान् नारायण के लिए है, इस भाव से समर्पित कर देना चाहिए।

श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध

यहाँ एक बहुत सरल और बहुत गहरी बात कही गई है। "देह, गेह में अहंता और ममता" — यही हमारी बेचैनी की जड़ है। "मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी नौकरी" — इस "मेरे" में जितना डूबे, उतनी बेचैनी।

और समाधान? यह नहीं कि घर-परिवार छोड़ दो। बल्कि — जो भी करो, भगवान् को समर्पित करो। तब "मेरा" धीरे-धीरे "उनका" बनने लगता है। और जब "उनका" बन जाए — तन्मयता अपने आप आती है।

३. भागवत पुराण — गोपियाँ — तन्मयता का सबसे जीवंत उदाहरण

गोपियों ने लोक-वेद की मर्यादा का परित्याग करके भगवान् की पदवी, उनके साथ तन्मयता और परम प्रेम प्राप्त कर लिया। उनके मन की प्रत्येक वृत्ति, संकल्प, वाणी और शरीर श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही आश्रित रहे। गोपियों को मोक्ष की भी इच्छा नहीं — क्योंकि वे श्रीकृष्ण में ही पूर्ण हैं।

श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, उद्धव तथा गोपियों की बातचीत

"मोक्ष की भी इच्छा नहीं" — यह वाक्य रुककर पढ़िए। गोपियाँ मोक्ष भी नहीं चाहतीं। क्योंकि मोक्ष भी एक "चाहत" है — और जहाँ चाहत है, वहाँ "मैं" है। गोपियों के पास "मैं" ही नहीं बचा था। केवल कृष्ण थे।

यही परम तन्मयता है। जब मोक्ष भी "छोटा" लगने लगे — क्योंकि जिसमें तन्मय हो, वह मोक्ष से बड़ा है।

४. श्री योगवासिष्ठ — स्वरूप जानने पर तन्मयता — भेद का अंत

जीव जब तक अपने परब्रह्मात्मक स्वभाव को नहीं जानता, तब तक वह संसाररूपी महासागर में भटकता रहता है। परंतु जब वह अपने स्वरूप को जान लेता है, तब तन्मयता को प्राप्त होकर निरामय उसी स्वरूप में स्थित हो जाता है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ८३

योगवासिष्ठ यहाँ तन्मयता का ज्ञानमार्गी रूप बताता है। भक्ति में तन्मयता प्रेम से आती है — ज्ञानमार्ग में वह स्वरूप-बोध से आती है।

"जब अपने स्वरूप को जान लेता है" — यानी जब यह पता चले कि मैं वास्तव में यह शरीर नहीं, यह मन नहीं — बल्कि वह परब्रह्म हूँ — तब तन्मयता अपने आप हो जाती है। क्योंकि जब "मैं ही वह हूँ" यह जान लिया — तो तन्मय होने के लिए कोई प्रयास नहीं चाहिए।

५. श्री योगवासिष्ठ — ईश्वरार्पण — तन्मयता का व्यावहारिक रूप

ईश्वर में तन्मयता की भावना को "ईश्वरार्पण" कहा गया है। इसका अर्थ है कि सभी व्यवहार उसी ईश्वर के विलास हैं जो सभी का उपादानकारण और सर्वान्तर्यामी है। इस भावना से सभी संकल्प-विकल्पों का त्याग हो जाता है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ५३

"सभी व्यवहार उसी ईश्वर के विलास हैं" — यह एक क्रांतिकारी दृष्टि है। खाना बना रहे हो — ईश्वर का विलास। ऑफिस जा रहे हो — ईश्वर का विलास। बच्चों से झगड़ा हो गया — वह भी ईश्वर का विलास।

जब यह दृष्टि बन जाए — तब "संकल्प-विकल्पों का त्याग" अपने आप होता है। क्योंकि जब सब कुछ ईश्वर का है — तो "मेरा क्या होगा" वाली चिंता कहाँ रहेगी?

६. एक अतिरिक्त दृष्टि — नवधा भक्ति — तन्मयता के नौ रास्ते

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥

श्रीमद्भागवत — सप्तम स्कंध

भागवत ने तन्मयता के नौ रास्ते दिए — श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। यह नौ इसलिए हैं क्योंकि हर व्यक्ति अलग है।

किसी को गाने में तन्मयता मिलती है — कीर्तन। किसी को सुनने में — श्रवण। किसी को सेवा में — दास्य। किसी को मित्र-भाव में — सख्य। जो भी रास्ता पकड़ो — गहरे उतरो। और गहरे उतरने पर सभी रास्ते एक जगह मिलते हैं।

जीवन में उपयोग

तन्मयता का अभ्यास बड़ी जगह से नहीं, छोटी जगह से शुरू होता है। यह दो अभ्यास करें।

पहला — आज से एक काम चुनें, जो भी सबसे पसंद हो — भजन सुनना, पूजा करना, शास्त्र पढ़ना। और वह काम करते समय सिर्फ एक नियम मानें — फोन नहीं, विचार नहीं, जल्दी नहीं। बस वह काम और आप। पहले दिन पाँच मिनट भी बहुत है।

दूसरा — धीरे-धीरे यह समय बढ़ाएं, दिन-प्रतिदिन थोड़ा और। एक दिन आप पाएँगे कि तन्मयता "करने" की चीज़ नहीं रही, वह होने लगी। उसी दिन से शास्त्र जो कह रहे हैं, उसकी झलक मिलने लगती है।

समग्र समझ

भागवत पुराण और योगवासिष्ठ दोनों तन्मयता को मोक्ष का सबसे सीधा रास्ता मानते हैं — पर दोनों अलग-अलग प्रवेश द्वार दिखाते हैं। भागवत कहता है — प्रेम से, भक्ति से, समर्पण से तन्मय हो जाओ — जैसे गोपियाँ हुईं। योगवासिष्ठ कहता है — ज्ञान से, स्वरूप-बोध से तन्मय हो जाओ — जैसे ब्रह्मज्ञानी होते हैं।

पर दोनों का गंतव्य एक — वह अवस्था जहाँ "मैं" नहीं रहता, केवल "वह" रहता है। और जब "मैं" नहीं — तब बेचैनी नहीं, भटकना नहीं, बंधन नहीं। यही तन्मयता का फल है।

इसी विषय पर और पढ़ें: श्रीकृष्ण ने गोपियों को “आसक्ति” और “समर्पण” में क्या भेद समझाया? तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासन की भूमिका मोक्ष प्राप्ति में क्या है?

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
तन्मयता किसी में पूरी तरह लीन हो जाना Complete absorption — losing oneself in something
ईश्वरार्पण ईश्वर को सब कुछ समर्पित करना Dedication of all actions to God
भागवत-धर्म सब कार्य ईश्वर के लिए करने का भाव Path of surrender — all acts for God
नवधा भक्ति भक्ति के नौ प्रकार Nine forms of devotion to God
स्वरूप अपना वास्तविक, मूल स्वभाव True original nature of the Self
माया संसार को सत्य प्रतीत कराने वाली शक्ति Illusion making the world appear real
वैराग्य सांसारिक विषयों से अनासक्ति Detachment from worldly objects

Sources

  • Shrimad Bhagwat Puran — Dwadash Skandh / मार्कण्डेयजी को भगवान् शंकर का वरदान
  • Shrimad Bhagwat Puran — Ekadash Skandh / वसुदेवजी के पास श्रीनारदजी का आना
  • Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / उद्धव तथा गोपियों की बातचीत और भ्रमरगीत
  • Shrimad Bhagwat Puran — Saptam Skandh / नवधा भक्ति का वर्णन
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग ८३
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध / सर्ग ५३
NM

Nripendra Mishra

Nripendra Mishra writes and curates content on Hindu scriptures and Vedanta philosophy for Guru's Adda, presenting the wisdom of the Bhagavad Gita, Yoga Vasistha, and other ancient texts in accessible Hindi.

Reviewed on 4 June 2026