रासलीला की वह रात याद है? गोपियाँ श्रीकृष्ण के साथ नाच रही थीं — और अचानक भगवान् अंतर्धान हो गए। गोपियाँ व्याकुल हो उठीं। ढूँढने लगीं — जंगल में, नदी किनारे, हर उस जगह जहाँ कभी कृष्ण के साथ बिताया था। और तब उन्होंने गाया वह प्रसिद्ध "गोपी गीत" — विरह से भरा, प्रेम से भीगा हुआ।
बाहर से देखें तो यह पूरी तरह आसक्ति जैसा लगता है। प्रियतम के बिछड़ने पर व्याकुलता, ढूँढना, रोना — यह तो वही है जो एक आम प्रेमी करता है। तो फिर गोपियों के प्रेम को शास्त्र सबसे ऊँचा भक्ति-आदर्श क्यों मानते हैं? आसक्ति और समर्पण में फर्क कहाँ है?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर स्वयं श्रीकृष्ण ने — कभी सीधे उपदेश से, कभी अपनी लीलाओं से — गोपियों को और हमें दिया।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भागवत — गोपियों को कोई इच्छा शेष नहीं — मोक्ष तक की नहीं
गोपियों ने लौकिक मर्यादा को सर्वथा त्यागकर भगवान् के ही स्वरूप को प्राप्त कर लिया — परम अनुराग और सम्पूर्ण समर्पण से। उनका चित्त, वाणी, संकल्प और शरीर की प्रत्येक गति केवल श्रीकृष्ण के चरणों में स्थित थी। गोपियों को मोक्ष तक की कामना नहीं थी — क्योंकि वे कृष्ण में ही सम्पूर्ण थीं।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, उद्धव के साथ गोपियों का संवाद
"मोक्ष तक की कामना नहीं" — यह पंक्ति ध्यान से पढ़िए। मोक्ष भी एक इच्छा ही है — और जहाँ इच्छा है, वहाँ "मैं" है। गोपियों में "मैं" का कुछ भी शेष नहीं बचा था। केवल कृष्ण थे।
यही आसक्ति और दायित्व में अंतर जैसा ही भेद है — आसक्ति में हमेशा कुछ पाने की, कुछ बचाए रखने की इच्छा होती है। समर्पण में वह इच्छा ही घुल जाती है।
२. श्रीमद्भागवत — उद्धव का संदेश — ज्ञान से नहीं, प्रेम से
उद्धवजी ने गोपियों को योग और ज्ञान का संदेश सुनाया। गोपियों ने कहा — हे उद्धव! यह योग-मार्ग उन्हीं के लिए है जिनका चित्त इंद्रियों के व्यापार में उलझा है। हमारा चित्त तो श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही डूबा हुआ है — हमें किसी और मार्ग की आवश्यकता नहीं।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, उद्धव-गोपी संवाद
यह उत्तर बहुत साहसी है। उद्धव — जो स्वयं ज्ञानी थे — गोपियों को तर्क और विवेक का मार्ग सुझा रहे थे। पर गोपियों ने विनम्रता से कहा — हमें उसकी ज़रूरत नहीं।
क्यों? क्योंकि आसक्ति में मन बाहर की वस्तुओं में उलझता है, इसलिए योग और वैराग्य की ज़रूरत पड़ती है — मन को खींचकर वापस लाने के लिए। पर समर्पण में मन कहीं बाहर गया ही नहीं — वह पहले से ही एक बिंदु पर टिका है। वहाँ किसी और साधन की ज़रूरत नहीं रहती।
३. श्रीमद्भागवत — रासलीला से पूर्व — अभिमान का भंग
जब गोपियों को अपने सौभाग्य पर थोड़ा गर्व हुआ — कि साक्षात् भगवान् उनके साथ रास कर रहे हैं — तब श्रीकृष्ण उसी क्षण अंतर्धान हो गए। यह अभिमान को दूर करने के लिए ही हुआ था।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, रासपंचाध्यायी
यह प्रसंग बहुत महत्त्वपूर्ण है। गोपियों के प्रेम में भी एक क्षण को सूक्ष्म अहंकार झलका — "मुझे यह सौभाग्य मिला है" — और भगवान् तुरंत ओझल हो गए।
यहीं आसक्ति और समर्पण का दूसरा भेद दिखता है। आसक्ति में "मुझे यह मिला" का भाव रहता है — उपलब्धि का, स्वामित्व का भाव। समर्पण में यह भाव भी नहीं टिकता। भगवान् ने अपनी लीला से ही यह सिखाया — प्रेम में गर्व की कोई जगह नहीं।
४. श्रीमद्भागवत — विरह में भी भगवान् का ही चिंतन — दुःख नहीं, दिव्य स्मरण
श्रीकृष्ण के अंतर्धान होने पर गोपियाँ वन में उन्हें ढूँढने लगीं। हर वृक्ष से, हर लता से पूछने लगीं — क्या तुमने हमारे प्राणनाथ को देखा? यह विरह उनके प्रेम की गहनता को ही प्रकट करता है, स्वार्थ को नहीं।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, गोपी-गीत
यहाँ एक स्पष्टता ज़रूरी है — विरह और मोह एक चीज़ नहीं हैं। गोपियों का विरह "मुझे कुछ खो गया" का दुःख नहीं था — यह "जिसमें मैं जीती हूँ, वह क्षणभर दूर है" का भाव था।
आसक्ति के विरह में स्वयं की हानि का भाव प्रधान होता है। समर्पण के विरह में केवल प्रियतम की स्मृति प्रधान होती है — अपने लिए कोई शिकायत नहीं। गोपियों ने वृक्षों से, लताओं से पूछा — पर कभी यह नहीं कहा "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ।"
५. श्रीमद्भगवद्गीता — अनन्य भक्ति का लक्षण — आसक्तिरहित, वैरभावरहित
जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को करने वाला है, मेरा भक्त है, मेरे परायण है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूत-प्राणियों में वैरभाव से रहित है — वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ११, विश्वरूपदर्शन योग
यह श्लोक गोपियों के प्रेम की कसौटी भी है। "आसक्तिरहित" — यानी परिणाम की चिंता नहीं। "वैरभाव रहित" — यानी किसी से ईर्ष्या नहीं, प्रतिस्पर्धा नहीं। गोपियों में एक-दूसरे के प्रति भी कोई स्पर्धा नहीं थी — हर गोपी बस अपने प्रेम में डूबी थी।
आसक्ति में हमेशा तुलना होती है — "मुझे उससे ज़्यादा मिले।" समर्पण में तुलना का कोई स्थान नहीं — क्योंकि वहाँ "मुझे" ही नहीं बचता, और यही वह पूर्ण तन्मयता है जिसका अभ्यास साधक कर सकता है।
६. श्रीमद्भागवत — भगवान् की स्तुति — गोपियों का ऋण कोई नहीं चुका सकता
श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा — हे गोपियो! तुम लोगों ने लौकिक-वैदिक मर्यादाओं को भी त्यागकर मेरा भजन किया है। मैं सैकड़ों वर्षों तक भी तुम्हारे ऋण से उऋण नहीं हो सकता। तुम्हारा यह निर्मल प्रेम ही तुम्हारा पुरस्कार है।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, रासपंचाध्यायी
यहाँ भगवान् स्वयं स्पष्ट करते हैं — "तुम्हारा प्रेम ही तुम्हारा पुरस्कार है।" कोई अतिरिक्त फल नहीं, कोई वरदान नहीं। प्रेम अपने आप में पूर्ण है — यही वह आत्म-समर्पण है जिसमें माया की कोई पकड़ नहीं रहती।
यही समर्पण की सबसे गहरी पहचान है — जहाँ प्रेम किसी बदले की अपेक्षा नहीं रखता। आसक्ति सदा कुछ माँगती है — साथ, सुरक्षा, प्रतिदान। समर्पण कुछ नहीं माँगता — वह स्वयं में पूर्ण है।
जीवन में उपयोग
अपने किसी प्रिय रिश्ते को इस कसौटी पर परखें — जब आप किसी को प्रेम करते हैं, एक पल रुककर पूछें: "क्या मुझे इसके बदले में कुछ चाहिए — ध्यान, प्रशंसा, सुरक्षा?" अगर हाँ, तो वहाँ आसक्ति की एक परत है। यह जानना कोई दोष नहीं — बस एक ईमानदार अवलोकन है।
और जब कभी प्रियजन से दूरी हो — देखें कि मन में क्या आता है: "मुझे तकलीफ है" या "बस उनकी याद है, कोई शिकायत नहीं।" यह फर्क धीरे-धीरे समझ आने लगे — तो समझिए, समर्पण की दिशा में एक कदम बढ़ गया है।
