आसक्ति और दायित्व में अंतर कैसे स्पष्ट करें?
एक माँ अपने बेटे की हर ज़रूरत पूरी करती है — खाना बनाती है, बीमार पड़े तो रात भर जागती है, उसकी हर तकलीफ अपनी तकलीफ लगती है। यह प्रेम है — या आसक्ति?
और एक डॉक्टर अपने मरीज़ की पूरी देखभाल करता है — रात को उठकर देखने जाता है, दिन भर उसकी चिंता में रहता है। पर मरीज़ चला जाए तो वह टूटता नहीं — अगले मरीज़ के पास चला जाता है। यह दायित्व है।
दोनों काम एक जैसे दिखते हैं। पर भीतर से बिल्कुल अलग। शास्त्रों ने इस फर्क को बहुत गहराई से समझाया है — आइए देखते हैं।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भगवद्गीता — आसक्तिरहित कर्तव्य ही भक्ति है
जो पुरुष केवल मेरे ही लिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को करने वाला है, मेरा भक्त है, मेरे परायण है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूत-प्राणियों में वैरभाव से रहित है — वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ११, विश्वरूपदर्शन योग
यहाँ भगवान् ने एक ही श्लोक में आसक्ति और दायित्व का पूरा सार कह दिया। "कर्तव्यकर्म करो — पर आसक्तिरहित होकर।" यानी काम वही, पर भाव अलग।
जब काम "मेरे लिए" होता है — वह आसक्ति है। जब काम "उनके लिए" होता है — वह दायित्व है। माँ जब बेटे की देखभाल "मेरा बेटा" के भाव से करती है — आसक्ति। जब "यह मेरा कर्तव्य है" के भाव से करती है — दायित्व। परिणाम एक, पर बंधन में फर्क आसमान-ज़मीन का।
२. श्री योगवासिष्ठ — आत्मसुख भूलकर बाहर ढूँढना — यही आसक्ति है
मनुष्य आत्मसुख को भूलकर इधर-उधर के तुच्छ विषयों से आभ्यंतर सुख चाहने लगता है — अतः जो वैषयिक सुखार्थिता है, यही बंधन की हेतु संग कहलाती है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ६८
यह बहुत सटीक बात है। हम सब भीतर से तृप्त हैं — पर हमें पता नहीं। इसलिए बाहर ढूँढते हैं — किसी व्यक्ति में, किसी वस्तु में, किसी उपलब्धि में। और जब वहाँ "अपना सुख" ढूँढने लगते हैं — वही आसक्ति बनती है।
दायित्व में यह नहीं होता। दायित्व में बाहरी काम होता है — पर सुख की तलाश बाहर नहीं। जो डॉक्टर मरीज़ की सेवा करता है — वह मरीज़ से अपना सुख नहीं माँगता। बस सेवा करता है। यही असंग स्थिति है।
३. श्री योगवासिष्ठ — तत्त्वज्ञ पुरुष — न इच्छा, न कर्तृत्व — फिर भी कर्म
आत्मस्वरूपज्ञ पुरुष सबसे अतीत हो जाता है, वह अपने ही स्वरूप में सदा संतुष्ट रहता है — इसलिए न कुछ चाहता है और न कुछ करता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ८९
"न कुछ चाहता, न कुछ करता" — पर फिर भी जीता है, कर्म करता है। यह विरोधाभास नहीं — यह दायित्व की परम अवस्था है। जब "मैं कर रहा हूँ" का भाव नहीं रहता — तो कर्म होता रहता है, पर आसक्ति नहीं होती।
जिस कर्म में फल की इच्छा है, "मेरा" का भाव है — वह आसक्ति है। जिस कर्म में न इच्छा है, न कर्तृत्व का अभिमान — वह दायित्व है। और यह अवस्था ज्ञान से आती है, जबरदस्ती से नहीं।
४. श्री योगवासिष्ठ — जीवन्मुक्त — संसार में हैं, पर चित्त में नहीं
जितेंद्रिय जीवन्मुक्त महात्मा लोग सत्त्व में स्थित होकर आसक्ति छोड़कर विहार करते हैं — चित्त में स्थित होकर कभी नहीं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग १०१
"सत्त्व में स्थित, आसक्ति छोड़कर विहार करते हैं।" यानी जीवन्मुक्त संसार में रहते हैं — पर उनका चित्त संसार में नहीं फँसता। वे कर्म करते हैं — दायित्व निभाते हैं — पर उनका मन उसमें "चिपकता" नहीं।
यही आसक्ति और दायित्व का सबसे सुंदर चित्र है। बाहर से दोनों एक जैसे दिखते हैं — पर जीवन्मुक्त भीतर से स्वतंत्र है, आसक्त व्यक्ति भीतर से बँधा है।
५. श्रीमद्भागवत — राजर्षि चित्रकेतु — प्रेम कब आसक्ति बनता है
जैसे किसी कंगाल को बड़ी कठिनाई से कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है — वैसे ही बहुत कठिनाई से प्राप्त हुए उस पुत्र में राजर्षि चित्रकेतु का स्नेहबंधन दिनोदिन दृढ़ होने लगा।
श्रीमद्भागवत — षष्ठ स्कंध, वृत्रासुर का पूर्वचरित्र
यह उपमा बहुत मार्मिक है। कंगाल को धन मिले — तो वह उसे पकड़ लेता है, छोड़ना नहीं चाहता। यही आसक्ति का स्वभाव है। "मुझे बड़ी मुश्किल से मिला — इसलिए यह मेरा है, यह जाना नहीं चाहिए।"
चित्रकेतु को पुत्र मिला — और उसी क्षण आसक्ति भी मिली। प्रेम था — पर वह "मेरा पुत्र" के भाव में बँध गया। और जब पुत्र गया — चित्रकेतु टूट गए। यही आसक्ति और दायित्व का फर्क है — आसक्ति में जाने पर दुख होता है, दायित्व में नहीं।
६. श्री योगवासिष्ठ — अहंकार खूँटा है, तृष्णा रस्सी — यही बंधन है
अहंकार ही जिसका मज़बूत आलान (हाथी बाँधने का खूँटा) है, तृष्णा ही जिसको बाँधने की रस्सी है — ऐसे जीवरूपी हाथी का उद्धार करना चाहिए।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ६४
हाथी और खूँटे की यह उपमा याद रहने वाली है। हाथी विशाल है — पर एक छोटी रस्सी और खूँटे से बँधा है। क्यों? क्योंकि उसे लगता है कि वह बँधा है।
हम भी ऐसे ही हैं। अहंकार खूँटा है — "मैं हूँ, यह मेरा है।" तृष्णा रस्सी है — "यह मुझे चाहिए, वह मुझे मिलना चाहिए।" और इन दोनों से बना जाल ही आसक्ति है। जब इन्हें काटो — कर्म होता रहेगा पर बंधन नहीं। वही दायित्व है।
७. विवेकचूड़ामणि — उपाधि हटे तो दायित्व, उपाधि रहे तो आसक्ति
जो समस्त उपाधियों को छोड़कर अखंड, परिपूर्ण आत्मभाव में स्थित रहता है — वही मुक्त है।
विवेकचूड़ामणि — असत्-परिहार
"उपाधि" — यानी "मैं पिता हूँ, मैं नेता हूँ, मैं मालिक हूँ" — ये सब उपाधियाँ हैं। जब इन उपाधियों से चिपककर कर्म होता है — वह आसक्ति है। जब उपाधि छूट जाए और कर्म सिर्फ आत्मभाव से हो — वह मुक्त दायित्व है।
शंकराचार्य जी कह रहे हैं — मुक्ति उसी को है जिसने उपाधियाँ छोड़ दीं। पर उपाधियाँ छोड़ने का मतलब घर-परिवार छोड़ना नहीं — भाव बदलना है। "मैं पिता हूँ" छोड़ो, पर "पिता का दायित्व" निभाते रहो।
८. स्कंद महापुराण — फल की आसक्ति छोड़ो, ज्ञान का आश्रय लो
जो स्वाधीन होते हैं और प्रमाद में न पड़कर सदा भगवान् शिव के ध्यान में तत्पर रहते हैं — वे कर्मफलों का परित्याग कर केवल ज्ञान का आश्रय लेकर परमपद को प्राप्त होते हैं।
स्कंद महापुराण — महेश्वर खंड, केदारखंड, अध्याय १०
स्कंद पुराण यहाँ दायित्व का सबसे व्यावहारिक सूत्र देता है — "कर्मफलों का परित्याग।" कर्म करो — पर फल की आसक्ति मत रखो। यही दायित्व और आसक्ति के बीच की रेखा है।
जब फल की परवाह है — आसक्ति है। जब फल की परवाह नहीं, केवल कर्म है — दायित्व है। और इस दायित्व भाव से किया गया कर्म — शिव तक पहुँचाता है।
जीवन में उपयोग
आसक्ति और दायित्व के फर्क को रोज़ के जीवन में पहचानने के लिए यह दो-चरण परीक्षण करें।
पहला — जो भी काम करें, दिन के अंत में खुद से पूछें: "अगर यह काम किसी ने देखा नहीं होता, कोई तारीफ नहीं होती, कोई फल नहीं मिलता — क्या मैं फिर भी यह करता?" अगर उत्तर "हाँ" है, तो वह दायित्व था। अगर "नहीं", तो आसक्ति थी।
दूसरा — जब किसी व्यक्ति के प्रति बहुत तीव्र "मेरा" का भाव आए, एक पल रुककर पूछें: "क्या मैं इनसे प्रेम कर रहा हूँ या इनसे कुछ चाहता हूँ?" यह एक प्रश्न आसक्ति और दायित्व के बीच का पूरा फर्क दिखा देता है।
