एक बार एक विद्वान पंडित जी से मिलना हुआ। उन्हें सैकड़ों श्लोक कंठस्थ थे, शास्त्रार्थ में कोई उन्हें जीत नहीं सकता था। पर घर जाकर पत्नी से झगड़ते थे, पड़ोसी से ईर्ष्या रखते थे, और धन के लिए चिंतित रहते थे।
और एक दूसरे बुजुर्ग थे — कम पढ़े-लिखे, शायद एक-दो श्लोक ही याद थे। पर उनके पास बैठने से मन शांत हो जाता था। किसी के प्रति कोई शिकायत नहीं, कोई चाहत नहीं, चेहरे पर एक स्थायी प्रसन्नता।
पहले पंडित जी थे — "ज्ञानबन्धु।" दूसरे बुजुर्ग थे — "ज्ञानी।" और यही अंतर है जो योगवासिष्ठ बहुत विस्तार से समझाता है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञानबन्धु कौन है?
जो शास्त्रों को केवल अपने भोग के लिए शिल्पी की तरह पढ़ता और उनकी व्याख्या करता है, परन्तु स्वयं ज्ञान के उपायभूत साधनचतुष्टय के सम्पादन और मनन आदि में प्रयत्न नहीं करता — वह पुरुष ज्ञानबन्धु कहा जाता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग २१
"शिल्पी की तरह" — यह उपमा बहुत सटीक है। एक बढ़ई लकड़ी काटता है — रोज़ काम करता है — पर वह लकड़ी उसके जीवन को नहीं बदलती। वैसे ही ज्ञानबन्धु शास्त्र पढ़ता है — रोज़ पढ़ता है — पर वह ज्ञान उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाता।
क्यों? क्योंकि वह "मनन आदि में प्रयत्न नहीं करता।" सुनना और मनन करना अलग है। शास्त्र सुना — पर उसे भीतर उतारने की कोशिश नहीं की। तो ज्ञान ऊपर-ऊपर रहता है — भीतर नहीं उतरता।
२. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञानबन्धु दूसरों को ठगता है, स्वयं नहीं बदलता
जिसका शास्त्राभ्यासजनित शाब्दिक बोध भोग-व्यवहारों में वैराग्योपरम आदि फलों से फलित नहीं दीखता — वह तत्त्वकथाओं द्वारा दूसरों को ठगने के लिए चातुर्यपूर्ण बोधरूपी शिल्पकारी से अपना जीवन निर्वाह करने वाला होने से ज्ञानबन्धु कहा गया है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग २१
यह बहुत कड़ी बात कही गई है — "दूसरों को ठगने के लिए।" पर यह झूठ नहीं। जब कोई भारी-भारी शब्दों में वेदांत बोले, पर उसके जीवन में वैराग्य का नाम न हो — तो वह "ज्ञान" असल में एक प्रदर्शन है।
और आज भी ऐसे लोग हैं — सोशल मीडिया पर, यूट्यूब पर, मंचों पर — जो तत्त्वज्ञान की बातें करते हैं, पर उनके जीवन में उसकी एक झलक भी नहीं दिखती। वे "ज्ञानबन्धु" हैं।
३. श्री योगवासिष्ठ — जो शास्त्र पढ़ने का फल "भोजन" समझे — वह नट है
एकमात्र भोजन, वस्त्र आदि से संतुष्ट होकर भोजन आदि की प्राप्ति को ही जो शास्त्राध्ययन का फल मानते हैं — उस शास्त्रार्थ कथा का अभिनय करने वालों को नटादि शिल्पियों के समान ही समझना चाहिए।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग १३
"नट" — यानी अभिनेता। जो मंच पर राजा का अभिनय करता है — पर घर जाकर गरीब ही रहता है। वैसे ही जो शास्त्र पढ़कर "ज्ञानी का अभिनय" करता है पर भीतर से वही पुराना अहंकारी व्यक्ति रहता है — वह नट है।
और यह बात हम सबको चुभनी चाहिए — क्या हम भी कहीं न कहीं यही कर रहे हैं? शास्त्र पढ़ते हैं, पर फल केवल यह चाहते हैं कि लोग "ज्ञानी" समझें?
४. श्री योगवासिष्ठ — अशुभ और शुभ ज्ञानबन्धुता
दुष्ट अभिमान आदि दोष तथा पारलौकिक अनर्थरूप फल के लिए कष्ट चेष्टापूर्वक कर्म करते हुए जो आत्मज्ञान को न प्राप्त कर अन्य ज्ञानलेश की प्राप्ति से संतुष्ट रहते हैं — वे अशुभ ज्ञानबन्धु कहे गए हैं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग १३
यहाँ एक सूक्ष्म बात है — योगवासिष्ठ दो प्रकार की ज्ञानबन्धुता बताता है। "अशुभ" — जहाँ अहंकार हो, और ज्ञान को केवल पारलौकिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाए। "शुभ" — जहाँ चित्तशुद्धि हो रही हो और निष्काम सत्कर्म हो रहे हों।
यानी सभी ज्ञानबन्धु एक जैसे नहीं होते। कुछ जानबूझकर ठग रहे होते हैं — वे अशुभ हैं। कुछ अभी यात्रा पर हैं — वे शुभ ज्ञानबन्धु हैं, जो धीरे-धीरे ज्ञानी की दिशा में बढ़ रहे हैं।
५. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञानी कौन है? — उपशम से शुद्ध
तृष्णारूपी तरंगों से अशान्त, आशारूपी मगरों से भरे हुए संसार-सागर को तैरकर मैं कब संतापरहित होऊँगा? ज्ञानी और समदृष्टि होकर मैं उपशम से शुद्ध, मुमुक्षुओं को प्राप्त होने योग्य।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग २
"उपशम से शुद्ध" — उपशम यानी शांति। ज्ञानी की पहचान यही है — एक गहरी, स्थायी शांति। न तृष्णा की तरंगें उसे डुबाती हैं, न आशा के मगर उसे खींचते हैं।
और "समदृष्टि" — सबको एक नज़र से देखना। मित्र-शत्रु, सुख-दुःख, मान-अपमान — सब में समान। यह वह गुण है जो ज्ञानबन्धु में नहीं होता — वह प्रशंसा से खुश होता है, निंदा से दुखी। और यही जीवन्मुक्त की पहचान की एक कसौटी भी है।
६. श्रीमद्भागवत — कलियुग में ज्ञानी वह है जिसका धैर्य टूटे नहीं
संसार में जहाँ देखो, वही सत्पुरुष दुःख से म्लान हैं और दुष्ट सुखी हो रहे हैं। इस समय जिस बुद्धिमान् पुरुष का धैर्य बना रहे — वही बड़ा ज्ञानी या पण्डित है।
श्रीमद्भागवत — नवम स्कंध
यह भागवत का बहुत व्यावहारिक कथन है। कलियुग में ज्ञानी की परिभाषा — "जिसका धैर्य बना रहे।" आज के समय में यह और भी प्रासंगिक है।
जब चारों ओर अन्याय हो, अच्छे लोग तकलीफ में हों और बुरे लोग मज़े में हों — उस स्थिति में जो व्यक्ति विचलित न हो, शांत रहे, धैर्य न खोए — वही ज्ञानी है। ज्ञानबन्धु उस स्थिति में या तो क्रोधित होगा या निराश।
७. श्रीमद्भागवत — रस्सी में साँप — ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि का फर्क
जैसे एक ही रस्सी का टुकड़ा भ्रांत पुरुषों को सर्प, माला, धारा आदि के रूप में प्रतीत होता है, किंतु जानकार को रस्सी के रूप में — वैसे ही आप भी भ्रांतबुद्धि वालों को कर्ता, भोक्ता आदि अनेक रूपों में दीखते हैं और ज्ञानी को शुद्ध सच्चिदानंद के रूप में।
श्रीमद्भागवत — षष्ठ स्कंध
यह उपमा हमेशा मन में बस जाती है। अंधेरे में रस्सी पड़ी हो — किसी को साँप दिखती है, किसी को माला, किसी को पानी की धारा। पर जिसे रोशनी हो — उसे रस्सी दिखती है।
ज्ञानबन्धु संसार को देखता है — विविधता में, भेद में, कर्ता-भोक्ता में। ज्ञानी वही देखता है जो है — एक अखंड सच्चिदानंद। यह दृष्टि का फर्क है — और यही ज्ञानबन्धु और ज्ञानी के बीच की असली रेखा है।
जीवन में उपयोग
यह जानने के लिए कि आप अभी ज्ञानबन्धु हैं या जीवन्मुक्त की दिशा में बढ़ रहे हैं, जो भी शास्त्र, प्रवचन या किताब पढ़ें, उसके बाद यह तीन-चरण आत्म-परीक्षण करें।
पहला — खुद से पूछें: "इसने मेरे भीतर कुछ बदला?" ईमानदारी से उत्तर दें, न कि वह उत्तर जो अच्छा लगे।
दूसरा — खुद से पूछें: "क्या मैं यह किसी को दिखाने के लिए पढ़ रहा था या खुद के लिए?" यह प्रश्न ज्ञानबन्धु की सबसे बड़ी कमज़ोरी — प्रदर्शन — को पकड़ता है।
तीसरा — खुद से पूछें: "इसका कोई असर मेरे कल के व्यवहार में दिखेगा?" जिस दिन इस तीसरे सवाल का जवाब "हाँ" आने लगे, उस दिन से यात्रा ज्ञानी की दिशा में सही तरह बढ़ रही है।
