कभी किसी नदी के किनारे बैठकर पानी देखा है? वही पानी जो पहाड़ से निकलता है — निर्मल, तेज़, स्वच्छ। पर जब वह मैदान में आता है — धीरे-धीरे उसमें गाद मिलती है, किनारों की मिट्टी मिलती है, रंग बदलने लगता है। पानी वही है — पर अब उसमें अपना मूल प्रतिबिंब नहीं दिखता।
जीव भी ऐसा ही है। मूल में निर्मल, चेतन, आनंदस्वरूप — ईश्वर का अंश। पर जैसे-जैसे संसार में आता है — शरीर, मन, बुद्धि की गाद चढ़ती जाती है। और एक दिन वह अपना मूल स्वरूप ही भूल जाता है।
इसी विस्मरण का नाम है — मोह। पर मोह को समझना केवल "यह बुरा है" जान लेना नहीं है। असली समझ तब आती है जब यह पता चले कि मोह कहाँ से जन्मता है, कैसे दिखता है — और सबसे ज़रूरी — इससे निकला कैसे जाए।
शास्त्रों से ज्ञान 📖
१. रामचरितमानस — जीव का मूल स्वभाव क्या है?
प्रश्न: जीव का मूल स्वभाव क्या है — और मोह कहाँ से आता है?
इस सवाल का जवाब रामचरितमानस में बड़ी सरलता से दिया गया है।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
रामचरितमानस — उत्तरकाण्ड, गोस्वामी तुलसीदास
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
अन्वय: जीव ईश्वर का अंश है — (अतः) वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है। (फिर भी) वह माया के वश हो गया — और तोते तथा बंदर की भाँति अपने आप ही बँध गया।
पद-विग्रह: ईस्वर अंस = ईश्वर का अंश | अमल = निर्मल, मलरहित | सहज सुख रासी = स्वभाव से ही सुख का भंडार | मायाबस = माया के वशीभूत | कीर = तोता | मरकट = बंदर
तुलसीदासजी ने यहाँ एक बड़ी बात कही — जीव का मूल स्वभाव क्या है? निर्मल। आनंदमय। अविनाशी। यह उसकी अर्जित संपत्ति नहीं — यह उसका जन्मसिद्ध स्वभाव है क्योंकि वह ईश्वर का अंश है।
फिर "कीर मरकट की नाईं" — यह उपमा ध्यान दीजिए 🐦। तोते को पकड़ने के लिए पिंजरे में अनाज रख देते हैं — वह खाने के लोभ में अंदर जाता है और बँध जाता है। बंदर को पकड़ने के लिए मटके में मिठाई रखते हैं — वह मुट्ठी भर लेता है, मुट्ठी बाहर नहीं निकलती — पर मिठाई भी नहीं छोड़ता। बँधा रहता है। यही मोह का स्वभाव है। जीव ने स्वयं अपनी मुट्ठी नहीं खोली।
२. श्रीमद्भगवद्गीता — जीव परमात्मा का अंश है, फिर भी प्रकृति को "मैं" मान लेता है
प्रश्न: जीव परमात्मा का अंश है — फिर भी प्रकृति के कार्यों को "मैं" मान लेता है?
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १५, श्लोक ७
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
अन्वय: जीवलोके जीवभूतः यः सनातनः (है) — (सः) मम एव अंशः (है)। (वह) प्रकृतिस्थानि मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि कर्षति।
पद-विग्रह: मम एव अंशः = मेरा ही अंश | जीवभूतः = जीव बना हुआ | सनातनः = सनातन, अनादि | मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि = मन सहित छः इंद्रियाँ | प्रकृतिस्थानि = प्रकृति में स्थित | कर्षति = खींचता है, अपना मान लेता है
जीव मेरा ही सनातन अंश है — पर वह क्या करता है? प्रकृति के कार्यों को — मन, बुद्धि, पाँचों इंद्रियों को — "कर्षति" — यानी अपनी ओर खींच लेता है, अपना मान लेता है।
यहीं से संकुचन शुरू होता है। जो असीम था — वह ससीम में सिमट गया। जो ब्रह्मांश था — वह शरीर में बँध गया। 🔗
३. ब्रह्म शब्द की व्युत्पत्ति — ब्रह्म का अर्थ ही विस्तार है
प्रश्न: ब्रह्म का अर्थ ही विस्तार है — और जीव उसे संकुचित कर लेता है?
यह बात समझने के लिए पहले "ब्रह्म" शब्द की व्युत्पत्ति देखनी होगी।
"ब्रह्म" शब्द संस्कृत की "बृह्" धातु से बना है। बृह् = बढ़ना, विस्तृत होना, महान होना।
अर्थात् — जो निरपेक्ष भाव से विस्तृत हो। जिसे छोटा करने वाला कोई पैमाना न हो। जो हर शर्त और हर स्थिति में बड़ा ही रहे — वह ब्रह्म है। ♾️
और जीव उसी ब्रह्म का अंश है। अब सोचिए — जो असीम का अंश हो, वह स्वभावतः क्या होगा? विस्तृत। निर्मल। आनंदमय। यह उसका स्वभाव है।
पर जब वह जीव शरीर को "मैं" मानने लगता है — मन को "मैं" मानने लगता है — बुद्धि को "मैं" मानने लगता है — तब असीम ब्रह्मांश एक पाँच फुट के शरीर में सिमट जाता है। यही संकुचन है।
४. श्री योगवासिष्ठ — परब्रह्मात्मक स्वभाव न जानने से भटकन
प्रश्न: यह संकुचन आगे कैसे बढ़ता है?
जीव जब तक अपने परब्रह्मात्मक स्वभाव को नहीं जानता, तब तक वह संसाररूपी महासागर में भटकता रहता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग २७
यह "भटकना" ही संकुचन का विस्तार है। देखिए यह क्रम कैसे चलता है 👇
जीव अपना परब्रह्मात्मक स्वभाव भूलता है
→ शरीर, मन, बुद्धि से एकाकार होने लगता है
→ संकुचन — असीम से ससीम
→ कर्तृत्व बुद्धि जागती है — "मैं कर रहा हूँ"
→ भोक्तृत्व बुद्धि जागती है — "मैं भोग रहा हूँ"
→ ममता — "यह मेरा है"
→ तृष्णा — "यह मुझे चाहिए"
→ यही मोह है 🌀
५. श्रीमद्भागवत — मोह का मूर्त रूप — परिचित चेहरों के भेष में
प्रश्न: और यह मोह दिखता कैसे है — उसका मूर्त रूप क्या है?
मोह कोई अलग चीज़ नहीं दिखता। वह हमेशा किसी परिचित चेहरे के भेष में आता है।
पति, पत्नी, बच्चे, माँ, बाप, मित्र, घर, नाते-रिश्तेदार — यही मोह के छद्म वेश हैं। और इनसे मोह बुरा नहीं लगता — बल्कि "यही तो जीवन है" लगता है। 💞
भगवन्! जब जीव माया से मोहित होकर अविद्या को अपना लेता है — उस समय उसके स्वरूपभूत आनंदादि गुण ढक जाते हैं। वह गुणजन्य वृत्तियों, इंद्रियों और देहों में फँस जाता है तथा उन्हीं को अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, वेदस्तुति
"उन्हीं को अपना आपा मानकर उनकी सेवा करने लगता है।" — यह वाक्य पूरे मोह का सार है। जीव उन चीज़ों की सेवा करने लगता है जो उसका "आपा" नहीं हैं — शरीर, मन, रिश्ते, संपत्ति। और इस सेवा में इतना डूब जाता है कि असली "आपा" — चेतन आत्मा — पीछे छूट जाती है।
हमारा बोध इन सबसे इतना गहरा हो जाता है कि हम इनके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर पाते। और इसी भाव में — इसी पकड़ में — मानव का पूरा जीवन खप जाता है।
६. श्रीमद्भगवद्गीता — फिर एक दिन काल पुरुष आता है 🕰️
प्रश्न: फिर एक दिन काल पुरुष आता है — और तब क्या?
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, श्लोक २२
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
अन्वय: यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि गृह्णाति — तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय अन्यानि नवानि संयाति।
पद-विग्रह: वासांसि = वस्त्र | जीर्णानि = पुराने, घिसे हुए | विहाय = छोड़कर | देही = आत्मा, शरीरधारी | संयाति = प्रस्थान करता है
जैसे पुराने वस्त्र उतारकर नए पहनते हैं — वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया धारण करती है। यह "कपड़े बदलना" है — पर जीव को लगता है जैसे सब कुछ समाप्त हो गया।
और फिर संकुचन की यात्रा आगे बढ़ती है। नया शरीर, नई पहचान, नए रिश्ते — और फिर वही मोह, वही पकड़, वही धुंध। 🌀
७. विवेकचूड़ामणि — मोह की धुंध — अज्ञान वह कुहरा है जो आत्मा को ढकता है
प्रश्न: तो क्या इस चक्र से निकलने का कोई उपाय है?
है — पर पहले एक कठिन सच्चाई स्वीकार करनी होगी। जन्म-जन्मान्तर का यह अभ्यास है। इतने जन्मों से हमने संकुचन को ही अपना स्वभाव मान लिया है — असीम होने से डर लगने लगा है। शंकराचार्यजी ने इसी को बड़ी सुंदरता से कहा —
जैसे कुहरे से आच्छादित वस्तु का स्वरूपतः ज्ञान न होकर विपरीत ज्ञान होता है — वैसे ही नीहार के सदृश स्वरूप-आच्छादन करने वाले अज्ञान से आवृत आत्मा का भी स्वरूपतः ज्ञान न होकर जो विपरीत अवलोकन है — वही जीव का स्वरूप है।
विवेकचूड़ामणि — अज्ञान निरूपण
कुहरे में पेड़ दिखता है — पर धुंधला। असली रूप नहीं दिखता। कभी-कभी कुछ और ही दिखने लगता है। 🌫️ मोह भी ऐसा ही कुहरा है। आत्मा है — पर कुहरे में ढकी है। और जीव उसे देख नहीं पाता।
शास्त्र कहते हैं — निकलने का रास्ता वही है जिससे घुसे थे। जिस रास्ते से शहर में घुसे — उसी से बाहर निकलते हैं। संकुचन की क्रिया को पलटना है — विस्तार की ओर चलना है।
८. स्वयं से शुरुआत — खुद को माफ करना 🙏
प्रश्न: स्वयं से शुरुआत — इसका क्या अर्थ है?
सबसे पहली बात — खुद को माफ करना।
अब तक जो हुआ, जितना किया, जैसा जीए — उससे बेहतर उस समय संभव नहीं था। क्योंकि जो ज्ञान अभी है, वह तब नहीं था। जीवन में जीवन से बढ़कर अमूल्य कुछ नहीं।
इसलिए आगे जो भी करना है — इस एक बात को ध्यान में रखकर करना है: किसी भी काम को अपनी चेतना पर हावी नहीं होने देना।
जो समस्त उपाधियों को छोड़कर अखंड, परिपूर्ण आत्मभाव में स्थित रहता है — वही मुक्त है।
विवेकचूड़ामणि — असत्-परिहार
"उपाधि" — यानी "मैं पिता हूँ, मैं मालिक हूँ, मैं यह शरीर हूँ" — ये सब उपाधियाँ हैं। जब इन्हें थोड़ा ढीला छोड़ते हैं — संकुचन पहली बार हिलता है।
९. श्रीमद्भागवत — "सब में एक" — इस सत्य को जीवन में कैसे उतारें?
प्रश्न: "सब में एक" — इस सत्य को जीवन में कैसे उतारें?
पहले एक और सत्य स्वीकार करना होगा। जो कुछ भी जीवन में हासिल किया — वह अकेले दम पर नहीं हुआ। आसपास के सहयोगियों की मेहनत थी, उनका भाग्य था, उनका स्नेह था — सब मिलकर हुआ। यह स्वीकार करना अहंकार को हल्का करता है।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽत्मनः।
श्रीमद्भागवत — द्वितीय स्कंध, चातुःश्लोकी भागवत
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥
अन्वय: तत्त्वजिज्ञासुना आत्मनः एतावत् एव जिज्ञास्यम् — यत् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां सर्वत्र सर्वदा स्यात्।
व्याख्या: आत्म-तत्त्व जानने के इच्छुक के लिए बस इतना जानना है — जो सृष्टि के आरंभ से अंत तक सभी में सदा एकसमान रहता है, वही आत्म-तत्त्व है।
यानी — जो सब में है, वही मुझमें है। और जो मुझमें है, वही सब में है। यह सत्य जब दिल में उतरता है — तब "मेरा और पराया" का भेद पहली बार हिलता है। ✨
१०. श्रीमद्भगवद्गीता — समदृष्टि — तीन चरणों में विस्तार की यात्रा 🗺️
प्रश्न: संकुचन से विस्तार — यह यात्रा कैसे होती है?
यहाँ एक क्रम है — तीन चरणों में।
पहला चरण — समानता का बोध:
यह स्वीकार करो — जैसे तुम हो, वैसे दूसरा भी है। सभी एक-सा सुख-दुःख झेल रहे हैं। कुछ किसी के साथ नया नहीं होता।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ५, श्लोक ७
अन्वय: सर्वभूतात्मभूतात्मा (यः) — (सः) कुर्वन् अपि न लिप्यते।
व्याख्या: जो सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा के समान देखता है — वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
दूसरा चरण — परिवार का विस्तार:
यह अभ्यास करो: "जैसे ये मेरे परिवार वाले हैं — वैसे दूसरों के भी परिवार वाले हैं। इसीलिए सभी परिवार मेरे अपने हैं।" 👨👩👧👦
हर माँ उतनी ही ममता से अपने बच्चे को देखती है जितनी तुम्हारी माँ ने तुम्हें देखा। यह काल्पनिक भावना नहीं — यह तथ्य है।
तीसरा चरण — मोक्ष के चार द्वारपाल:
योगवासिष्ठ मोक्ष के चार द्वारपाल बताता है — शम (मन की शांति), विचार (विवेक), संतोष और साधुसंग।
इन चारों में से एक भी पकड़ लो — बाकी तीन धीरे-धीरे आते हैं।
संकुचन की यात्रा कैसी थी?
ब्रह्म → जीव → देह से एकाकार → "मैं" → "मेरा" → मोह ⬇️
विस्तार की यात्रा उलटी है —
"मेरा" ढीला करो → "मैं" हल्का करो → देह से भेद जानो → ब्रह्मांश स्वभाव याद करो → ब्रह्म में विश्राम ⬆️
अहं ब्रह्मास्मि।
बृहदारण्यक उपनिषद् — १.४.१०
अन्वय: अहम् = मैं, ब्रह्म = परमसत्य, अस्मि = हूँ।
यह महावाक्य मोह का सबसे सीधा उत्तर है। जब यह "जान" लिया — न सुना, न पढ़ा — बल्कि जान लिया — तब संकुचन की जड़ कट जाती है। क्योंकि ब्रह्म संकुचित नहीं हो सकता — बृह् धातु से बने ब्रह्म का स्वभाव ही विस्तार है। ✨
समग्र समझ
तुलसीदासजी, भगवान् श्रीकृष्ण, योगवासिष्ठ, भागवत, विवेकचूड़ामणि और उपनिषद — सब एक ही बात कह रहे हैं, अलग-अलग भाषा में। जीव का मूल स्वभाव ब्रह्मांश है — विस्तृत, निर्मल, आनंदमय। पर वह अपना यह स्वभाव भूलकर प्रकृति के कार्यों को "मैं" मान लेता है। यह संकुचन है। इस संकुचन से जो धुंध छाती है — वही मोह है।
और निकलने का रास्ता? वही जिससे घुसे थे — पर उलटी दिशा में। पहला कदम छोटा है — खुद को माफ करो। दूसरा कदम — दूसरों के सुख-दुःख को अपना मानो। तीसरा कदम — "सभी परिवार मेरे" — यह भावना सींचो।
और जिस दिन यह यात्रा पूरी होती है — उस दिन तुलसीदास की वह चौपाई जीवंत हो उठती है: ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ — जो थे, वही हो जाते हो। यात्रा समाप्त नहीं होती — यात्रा का भ्रम समाप्त होता है। 🙏
लेखक का मत ✍️
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| मोह | चेतना का विस्मरणजन्य भ्रम | Delusion arising from forgetfulness of true nature |
| संकुचन | असीम से ससीम हो जाना | Contraction — infinite limiting itself |
| विस्तार | संकुचन का विलोम — ब्रह्म का स्वभाव | Expansion — the natural state of Brahman |
| बृह् धातु | विस्तृत होना — ब्रह्म की व्युत्पत्ति | Sanskrit root of Brahman — to expand |
| कर्तृत्व बुद्धि | "मैं करता हूँ" का भ्रामक बोध | False sense of being the doer |
| समदृष्टि | सब में अपना स्वरूप देखना | Equal vision — seeing Self in all beings |
| साधुसंग | संतों और ज्ञानियों का सत्संग | Company of the wise — path to expansion |
जीवन में उपयोग 🌱
संकुचन से विस्तार की यात्रा के तीन व्यावहारिक कदम — पहला: जब भी "मेरा" का भाव बहुत तीव्र हो — एक पल रुककर पूछें: "क्या यह सच में मेरा है?" घर — क्या आने से पहले था? शरीर — क्या हमेशा रहेगा? यह प्रश्न संकुचन को धीरे-धीरे ढीला करता है।
दूसरा: आज किसी एक व्यक्ति को देखो जिससे दूरी है — और मन में एक बार सोचो: "इसकी माँ भी उसी ममता से इसे देखती होगी जैसे मेरी माँ मुझे देखती है।" बस यह एक विचार — "मेरा vs पराया" की दीवार में पहली दरार डालता है।
तीसरा: रोज़ सोने से पहले एक मिनट के लिए मन में कहो: "आज जो हुआ — वह हो गया। मैं उससे बेहतर नहीं कर सकता था। मैं माफ हूँ।" 🙏 यह एक मिनट — अगले दिन को थोड़ा हल्का बनाता है।
Sources
- रामचरितमानस — उत्तरकाण्ड / गोस्वामी तुलसीदास
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 2, Shloka 22 (वासांसि जीर्णानि)
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 5, Shloka 7 (सर्वभूतात्मभूतात्मा)
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 15, Shloka 7 (ममैवांशो जीवलोके)
- Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / वेदस्तुति
- Shrimad Bhagwat Puran — Dwitiya Skandh / चातुःश्लोकी भागवत
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग २७
- Viveka Chudamani — असत्-परिहार, अज्ञान निरूपण
- बृहदारण्यक उपनिषद् — १.४.१०
