एक माँ अपने बेटे से इतनी ज़्यादा जुड़ी थी कि जब वह पहली बार शहर से बाहर नौकरी करने गया — वह तीन दिन तक ठीक से खाना नहीं खा पाई। बेटा था, सही-सलामत था — पर उसकी अनुपस्थिति असहनीय थी।
यह प्रेम था — या मोह?
यही सवाल शास्त्रों के केंद्र में है। मोह दिखने में प्रेम जैसा लगता है — पर है बिल्कुल अलग। प्रेम देता है, मोह पकड़ता है। प्रेम मुक्त करता है, मोह बाँधता है। और यही मोह — यह "पकड़" — संसार के सारे दुःख की जड़ है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्री योगवासिष्ठ — मोह है "अहंकार की भ्रांति"
संसार की समस्त वस्तुएं जो दिखाई देती हैं, वे संवित् का यानी चिति का विवर्त हैं। यदि इन्हें चेतना का विवर्त न माना जाए, तो इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह जाता और ये असत् ही सिद्ध होती हैं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग १२२
यह एक गहरी बात है। योगवासिष्ठ कह रहा है — जो कुछ भी दिखता है, वह चेतना का ही एक रूप है। जैसे सपने में जो दिखता है — वह "सपने देखने वाली चेतना" का ही विस्तार है।
तो फिर मोह क्या है? जब हम उस "दिखने वाली चीज़" को सत्य मान लेते हैं — उसमें आसक्त हो जाते हैं — वही मोह है। जैसे सपने में कोई प्रिय वस्तु मिले और हम उसे असली मान लें। जागने पर दुःख होता है — क्योंकि वह थी नहीं।
२. श्री योगवासिष्ठ — चेतना ही कर्ता, भोक्ता, संहारक बनती है
यह काल ही सृष्टिकाल में संसार का कर्ता, भोक्ता, संहारक, स्मर्ता आदि सब पदार्थों के स्वरूप को प्राप्त हुआ है — अर्थात् यह स्वयं ही कर्ता, भोक्ता, संहारक, सुभग, दुर्भग आदि बना।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण, सर्ग २३
यह एक और सूक्ष्म बात है। चेतना ही सब कुछ बनती है — कर्ता भी, भोक्ता भी। पर जब वह चेतना भूल जाती है कि वह चेतना है — और सोचने लगती है कि "मैं यह शरीर हूँ, यह परिवार मेरा है, यह संपत्ति मेरी है" — तब मोह जन्म लेता है।
मोह का मूल कारण यही है — "मैं" और "मेरा" की भ्रांति। जब इन दो शब्दों की पकड़ ढीली पड़ती है — मोह भी ढीला पड़ता है।
३. श्री योगवासिष्ठ — मोह से भ्रमण, स्वरूप से मुक्ति
जीव जब तक अपने परब्रह्मात्मक स्वभाव को नहीं जानता, तब तक वह संसाररूपी महासागर में भटकता रहता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग २७
भटकना — यह मोह का सबसे सटीक चित्र है। हम भटकते हैं — एक चाहत से दूसरी चाहत पर, एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते पर, एक लक्ष्य से दूसरे लक्ष्य पर। और हर बार लगता है — "यह मिल जाए तो शांति होगी।" पर होती नहीं।
क्योंकि भटकना मोह की स्वाभाविक स्थिति है। और शांति तब है — जब अपना असली स्वभाव जान लिया जाए। ज्ञान के बिना मोह नहीं जाता — चाहे कितनी भी चाहतें पूरी हों।
४. विवेकचूड़ामणि — मोह वह पर्दा है जो परम सत्य को ढकता है
सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम् — जो अज्ञेय होकर भी सम्पूर्ण वेदांत के सिद्धांत-वाक्यों से जाने जाते हैं, वे परमानंदस्वरूप ब्रह्म हैं।
विवेकचूड़ामणि — मंगलाचरण
विवेकचूड़ामणि यहाँ सीधे मोह की बात नहीं करती — पर परोक्ष रूप से सबसे बड़ी बात कहती है। परम सत्य — ब्रह्म — सदा मौजूद है। फिर भी हम उसे नहीं देख पाते।
क्यों? क्योंकि मोह का पर्दा है। जैसे बादल सूरज को नहीं मिटाते — पर ढक लेते हैं। मोह भी ऐसा ही है — वह ब्रह्म को मिटाता नहीं, पर हमारी दृष्टि ढक लेता है। और जब मोह का पर्दा हटता है — परम सत्य अपने आप दिखने लगता है।
५. श्रीमद्भागवत — हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद — मोह और तन्मयता का आमना-सामना
प्रह्लाद की भगवन्मयता को तीव्र तन्मयता के फलस्वरूप बताया गया है। हिरण्यकशिपु का अपने पुत्र से द्वेष और प्रह्लाद का भगवान् में लीन होना — दोनों एक ही परिवार में, एक ही समय में।
श्रीमद्भागवत — सप्तम स्कंध, नारद-युधिष्ठिर संवाद
यह प्रसंग बहुत शिक्षाप्रद है। एक ही घर में — पिता मोह में डूबा है, पुत्र तन्मयता में। हिरण्यकशिपु को "मेरा पुत्र मेरे विरुद्ध है" यह मोह था। और इस मोह ने उसे इतना अंधा कर दिया कि वह अपने ही बेटे का दुश्मन बन गया।
प्रह्लाद के पास यह मोह नहीं था — न पिता की नाराज़गी का, न मृत्यु के भय का। केवल भगवान् में तन्मयता थी। और यही तन्मयता — मोह की पूर्ण विपरीत अवस्था — उन्हें अजेय बनाती थी।
६. एक अतिरिक्त दृष्टि — गीता में मोह का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २, श्लोक २
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं — "यह कायरता तुझे विषम समय में कहाँ से आई?" अर्जुन का मोह क्या था? अपने स्वजनों से — भीष्म, द्रोण, कुल। इस मोह ने उसे युद्धभूमि में बैठा दिया था।
और गीता — जो मोह-नाश का सबसे बड़ा शास्त्र है — यहीं से शुरू होती है। अर्जुन के मोह से। यानी मोह ही वह "समस्या" है — जिसके समाधान में पूरी गीता है।
समग्र समझ
तीनों शास्त्र मिलकर मोह का एक पूरा चित्र बनाते हैं। योगवासिष्ठ कहता है — मोह अहंकार की भ्रांति है, चेतना का विकार है। विवेकचूड़ामणि कहती है — मोह वह पर्दा है जो परम सत्य को ढकता है। भागवत कहता है — मोह का व्यावहारिक रूप है द्वेष, आसक्ति, पकड़ — और इसका विपरीत है तन्मयता।
और समाधान? तीनों एक स्वर में कहते हैं — ज्ञान से, भक्ति से, और "मेरा" के बोझ को हल्का करने से मोह छटता है। और जब छटता है — तो पता चलता है कि जो ढका था, वह हमेशा से था — वह परम सत्य, वह शांति।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| मोह | अज्ञान से उत्पन्न भ्रम और आसक्ति | Delusion and attachment arising from ignorance |
| अहंकार | "मैं" और "मेरा" का भ्रामक बोध | Mistaken identification with ego — "I" and "mine" |
| संवित् | चेतना, चित्त | Pure Consciousness, awareness |
| विवर्त | भ्रामक परिवर्तन, चेतना का विकार | Illusory modification of consciousness |
| कर्ता | कार्य करने वाले का भ्रामक भाव | False sense of being the doer |
| भ्रांति | असत्य को सत्य मानना | Illusion — mistaking the unreal for real |
| तन्मयता | ईश्वर में पूरी तरह लीन होना — मोह का विपरीत | Complete absorption in God — opposite of moha |
जीवन में उपयोग
मोह को पहचानने का सबसे सरल तरीका — जब भी कोई परिस्थिति बहुत ज़्यादा परेशान करे, एक पल रुककर पूछें: "मैं किससे चिपका हूँ?" — किसी व्यक्ति से, किसी वस्तु से, किसी परिणाम से? जब यह "चिपकी हुई चीज़" दिख जाए — वही मोह है।
और फिर एक और सवाल — "क्या यह सदा रहेगी?" अगर नहीं — तो इसे थोड़ा हल्के हाथ से पकड़ें। यह "हल्का पकड़ना" — धीरे-धीरे मोह को प्रेम में बदलता है। और प्रेम — जो पकड़ता नहीं — वही मुक्त करता है।
Sources
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध / सर्ग १२२
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग २७
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग २३
- Viveka Chudamani — मंगलाचरण
- Shrimad Bhagwat Puran — Saptam Skandh / नारद-युधिष्ठिर संवाद
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 2, Shloka 2
