आत्मा और परमात्मा का स्वरूप क्या है?
बचपन में एक सवाल बहुत परेशान करता था — "मैं कौन हूँ?" शरीर? मन? विचार? पर शरीर तो बदलता रहता है — बचपन का शरीर, जवानी का शरीर, बुढ़ापे का शरीर — तीनों अलग। विचार भी बदलते हैं — जो कल सही लगा था, आज गलत लगता है। तो फिर वह "मैं" कौन है जो इन सबको देखता है? जो हमेशा वही रहता है?
भारतीय शास्त्रों ने इस सवाल का जवाब दो शब्दों में दिया — आत्मा और परमात्मा। और फिर एक और बड़ी बात कही — ये दो नहीं, एक ही हैं।
यह समझना आसान नहीं। पर शास्त्रों ने इसे बहुत सुंदर तरीकों से समझाया है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्रीमद्भागवत — परमात्मा ने ब्रह्माजी को क्या बताया?
सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही था। सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ। जो अनिर्वचनीय वस्तु मुझमें मिथ्या प्रतीत होती है — वह मेरी माया है। मैं प्राणियों के शरीर में आत्मा के रूप में प्रवेश करता हूँ, परंतु आत्मदृष्टि से मेरे अतिरिक्त कोई वस्तु न होने के कारण प्रविष्ट भी नहीं हूँ।
श्रीमद्भागवत — द्वितीय स्कंध, भगवान् द्वारा ब्रह्माजी को चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश
यह श्लोक भगवान् ने स्वयं ब्रह्माजी को सुनाया था — और यह पूरे वेदांत का सार है। "सृष्टि से पहले मैं था, सृष्टि के रूप में भी मैं हूँ।" यानी यह जो संसार दिखता है — पहाड़, नदी, लोग, आकाश — सब परमात्मा का ही विस्तार है।
और फिर वह अद्भुत बात — "प्रवेश करता हूँ, पर प्रविष्ट भी नहीं हूँ।" क्योंकि जब सब कुछ वही है — तो अलग से कहाँ "प्रवेश" करेगा? यह वैसे ही है जैसे पानी, बर्फ में "प्रवेश" नहीं करता — वह खुद ही बर्फ बन जाता है।
२. श्रीमद्भागवत — परमात्मा के लीलावतार — दिव्यता का प्रकटीकरण
परम पुरुष परमात्मा के प्रधान लीलावतारों का वर्णन श्रवण करने में मधुर और इंद्रियों के दोषों को दूर करने वाला है।
श्रीमद्भागवत — द्वितीय स्कंध, विराटस्वरूप की विभूतियों का वर्णन
परमात्मा एक ही है — पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है। राम, कृष्ण, बुद्ध — ये सब उसी एक परमात्मा की अभिव्यक्तियाँ हैं। और इन अवतारों की कथाएँ सुनना — यह भी एक साधना है। क्योंकि जब हम परमात्मा की लीला सुनते हैं — तो मन उस दिशा में मुड़ता है। और जिस दिशा में मन मुड़े — उसी में विकास होता है।
३. श्रीमद्भागवत — परमात्मा की कृपा — तपस्या और स्तोत्र से मिलती है
परमात्मा का यह स्तोत्र एकाग्रचित्त से जपते हुए महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होने पर इसी से तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जाएगा।
श्रीमद्भागवत — चतुर्थ स्कंध, भगवान् रुद्र का उपदेश
यहाँ एक व्यावहारिक बात है — परमात्मा को "जानना" केवल बौद्धिक काम नहीं है। उसके लिए तपस्या चाहिए, एकाग्रता चाहिए, स्तोत्र-जप चाहिए। ज्ञान और साधना — दोनों मिलकर परमात्मा का बोध देते हैं। केवल किताब पढ़ने से नहीं होता।
४. श्री योगवासिष्ठ — वही परमात्मा विष्णु है, चंद्र है, सागर है, काल है
वही परमात्मा विष्णु, पितामह, चंद्र, सूर्य, इंद्र, वायु, मेघ, सागर और काल आदि के रूप में स्थित होता है। श्रुतियाँ भी इसी को सर्वव्यापी ब्रह्म, हरि, प्राण, अग्नि, चंद्रमा आदि बताती हैं। चिदाकाशरूप ब्रह्म ही अज्ञ-दृष्टि से जीव और जगत् के रूप में स्थित है, और तत्त्वदृष्टि से बोधस्वरूप होकर अपने स्वरूप में स्थित है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ८३
यह श्लोक पढ़ते हुए एक अद्भुत बात महसूस होती है। विष्णु भी वही, शिव भी वही, सूर्य भी वही, सागर भी वही, काल भी वही। यानी जो भी है — सब उसी एक का विस्तार है।
और दो दृष्टियाँ बताई गई हैं — "अज्ञ-दृष्टि" में जीव और जगत् अलग-अलग दिखते हैं। "तत्त्वदृष्टि" में सब एक ही बोधस्वरूप दिखता है। हम अभी अज्ञ-दृष्टि से देख रहे हैं — इसीलिए अलगाव लगता है। जब तत्त्वदृष्टि खुलती है — सब एक हो जाता है।
५. श्री योगवासिष्ठ — आत्मा न जन्मती है, न मरती है — स्वप्रकाश है
आत्मा सब व्यवहारों से दूर है, फिर भी प्रिय और अप्रिय का निवाहक है। आत्मा न तो उत्पन्न होता है, न मरता है, न कुछ चाहता है, न मुक्त होता है और न बद्ध होता है। वह स्वप्रकाश स्वरूप है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ७३
यह आत्मा का सबसे सुंदर वर्णन है। "न जन्मती, न मरती, न कुछ चाहती, न मुक्त होती, न बद्ध होती।" तो फिर आत्मा करती क्या है? बस — है। सदा है।
और "स्वप्रकाश" — यानी आत्मा को किसी बाहरी प्रकाश की ज़रूरत नहीं। जैसे सूरज को दीपक दिखाने की ज़रूरत नहीं — वह खुद प्रकाश है। वैसे ही आत्मा — वह स्वयं प्रकाश है। बाहर से कोई उसे रोशन नहीं करता।
६. श्री योगवासिष्ठ — पंखे से वायु, पुर्यष्टक से "अहम्" प्रकट होता है
जैसे पंखे से वायु अभिव्यक्त होता है, वैसे ही पुर्यष्टक के उदय से सर्वत्र स्थित आत्मा "अहम्" रूप से अभिव्यक्त होता है। महेश्वर चित्स्वरूप परमात्मा सर्वत्र व्यापक हैं, किसी एक देह में सीमित नहीं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण, सर्ग ७३
यह उपमा बहुत सटीक है। पंखा चलाओ — हवा लगती है। पंखा बंद करो — हवा नहीं लगती। पर हवा गई नहीं — वह तो थी, है और रहेगी। पंखा केवल उसे अनुभव करने का माध्यम था।
वैसे ही यह शरीर — यह "पुर्यष्टक" — केवल एक माध्यम है जिसके ज़रिए वह सर्वव्यापी परमात्मा "अहम्" के रूप में अनुभव होता है। परमात्मा कहीं सीमित नहीं — शरीर केवल उसे महसूस करने का उपकरण है।
७. एक अतिरिक्त दृष्टि — माण्डूक्य उपनिषद् और तैत्तिरीय उपनिषद् का सार
अयमात्मा ब्रह्म। — यह आत्मा ब्रह्म है।
माण्डूक्य उपनिषद् व छांदोग्य उपनिषद्
सर्वं खल्विदं ब्रह्म। — यह सब कुछ ब्रह्म है।
उपनिषद् ने सब कुछ दो-दो वाक्यों में कह दिया। "यह आत्मा ब्रह्म है" — यानी भीतर जो है, वह परमात्मा है। "यह सब ब्रह्म है" — यानी बाहर जो है, वह भी परमात्मा है। फिर भेद कहाँ?
भेद है — पर केवल माया में। जैसे एक ही सागर में अलग-अलग लहरें उठती हैं — हर लहर अलग दिखती है, पर सब पानी हैं। हम सब भी ऐसी ही लहरें हैं — उसी एक सागर की।
जीवन में उपयोग
आत्मा और परमात्मा के इस ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए यह दो अभ्यास करें।
पहला — रोज़ एक पल के लिए रुकें और पूछें: "अभी जो सोच रहा हूँ — उसे देख कौन रहा है?" यह "देखने वाला" ही आत्मा है, वही परमात्मा है।
दूसरा — जब किसी से मिलें, चाहे मित्र हो या शत्रु, एक बार मन में सोचें: "इसमें भी वही है।" यह अभ्यास धीरे-धीरे उस एकता का अनुभव देता है जिसकी बात शास्त्र कर रहे हैं, और जब यह एकता महसूस होने लगे, तो न क्रोध रहता है, न ईर्ष्या, न भय — केवल शांति।
