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आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को अनुभव करने में अहंकार की क्या भूमिका है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

Nripendra Mishra8 March 2026
सारांश: आत्मा और परमात्मा एक हैं, फिर भेद क्यों महसूस होता है? जानें अहंकार की भूमिका और शास्त्रों के अनुसार इसे दूर करने के साधन।
आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को अनुभव करने में अहंकार की क्या भूमिका है और इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

एक छोटी सी कहानी है — एक लहर समुद्र से डर गई। उसे लगा — "मैं कमज़ोर हूँ, छोटी हूँ, जल्द ही मर जाऊँगी।" दूसरी लहर ने कहा — "तू समुद्र को भूल गई है।" पहली लहर बोली — "पर मैं लहर हूँ, समुद्र नहीं।" दूसरी ने कहा — "यही तेरी गलती है।"

यह कहानी आत्मा और परमात्मा के संबंध की सबसे सरल व्याख्या है। लहर समुद्र से अलग नहीं है — पर लहर को लगता है कि वह अलग है। और जो यह "अलगपन" महसूस कराता है — वह है अहंकार।

शास्त्र कहते हैं — जब यह अहंकार जाए, तब आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता अपने आप प्रकट होती है। पर अहंकार जाए कैसे? यही इस लेख का मूल प्रश्न है।

शास्त्रों से ज्ञान

१. श्री योगवासिष्ठ — अहंकार क्या है? — चित्त की भेदवासना

चिदाभास के चित्त को प्राप्त होने पर उससे व्याप्त अहंकार को ही आत्मरूप से तथा उससे अतिरिक्त को अनात्मरूप से मान रहा मन — आध्यात्मिक और अनाध्यात्मिक में भेद करता है। यह चित्त की भेदवासनारूपिणी शक्ति यदि अधिष्ठानसन्मात्र से अतिरिक्त मानी जाय, तो मिथ्या हो जाएगी।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — स्थिति प्रकरण, सर्ग ११

योगवासिष्ठ यहाँ अहंकार की जड़ बता रहा है — "भेदवासना।" यानी "यह मेरा है, वह मेरा नहीं" — यह भेद देखने की आदत। यही आदत "मैं" बनाती है।

और सबसे गहरी बात — यह भेद "मिथ्या है।" जैसे अंधेरे में रस्सी में साँप दिखता है — असली नहीं होता। वैसे ही अहंकार द्वारा दिखाया गया "मैं अलग हूँ" — यह भ्रम है, सत्य नहीं।

२. श्री योगवासिष्ठ — मरुभूमि में जल — अहंकार की प्रतीति भी ऐसी ही है

जैसे यह मरुभूमि है, जल नहीं है — इस ज्ञान से मरुभूमि में जल की प्रतीति शांत हो जाती है। वैसे ही आत्मा के परिज्ञान से इसकी यह देहादि-भ्रांति शीघ्र शांत हो जाती है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग १८६

मरुभूमि में पानी दिखता है — पर है नहीं। जानकार को पता होता है — और वह दौड़ता नहीं। अज्ञानी दौड़ता है और थक जाता है।

अहंकार भी ऐसा ही है। "मैं यह शरीर हूँ, यह परिवार मेरा है, यह सुख मुझे चाहिए" — यह सब उस मरुभूमि के पानी जैसा है। जब आत्मज्ञान होता है — यह प्रतीति शांत हो जाती है। अहंकार गायब नहीं होता — बस उसकी पकड़ ढीली पड़ जाती है।

३. श्री योगवासिष्ठ — स्वप्न और जाग्रत एक समान — जगत और जीव में क्या भेद?

जैसे स्वप्नभूमियों में जो कुछ भी दृश्य है, वह सबका सब चित्त ही है — वैसे ही जाग्रत जगत् में भी जो कुछ भी दृश्य है, वह सम्पूर्णतया चित्त ही है। वही जीव है — इसलिए जगत् और जीव में कौन भेद है?

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग १८६

यह एक क्रांतिकारी बात है। स्वप्न में जो दुनिया दिखती है — वह चित्त की रचना है। जागने पर जो दुनिया दिखती है — वह भी चित्त की रचना है। दोनों में फर्क क्या?

और अगर दोनों चित्त ही हैं — तो "मैं" और "यह दुनिया" में भेद कहाँ? दोनों एक ही चेतना के रूप हैं। यह बोध होते ही अहंकार का "मैं अलग हूँ" वाला दावा कमज़ोर पड़ जाता है।

४. श्री योगवासिष्ठ — हाथी और खंभा — आत्मा अपनी इच्छा से मुक्त हो सकती है

जैसे हाथी अपने बंधनस्तंभ से छुटकारा पाता है — वैसे ही आत्मा अपनी इच्छा से अपने पूर्ण स्वरूप का अनुभव कर संसार से मुक्त होता है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — स्थिति प्रकरण, सर्ग ११

यह उपमा बहुत शक्तिशाली है। हाथी खंभे से बँधा होता है — पर क्या वह खंभा तोड़ नहीं सकता? तोड़ सकता है। बस उसे यह जानना है कि वह तोड़ सकता है।

हम भी ऐसे ही अहंकार के खंभे से बँधे हैं। पर "अपनी इच्छा से" — यानी जब साधक सच में यह जानना चाहे कि वह कौन है — तब बंधन टूट सकता है। अहंकार से मुक्ति बाहर से नहीं आती — भीतर से आती है।

५. श्रीमद्भागवत — अहंकार त्रिगुणों से जन्मा — अज्ञान का मूलकारण

प्रकृति से महत्त्व बनता है और महत्त्व से अहंकार। इस प्रकार यह अहंकार गुणों के क्षोभ से उत्पन्न हुआ प्रकृति का ही एक विकार है। अहंकार के तीन भेद हैं — सात्त्विक, तामस और राजस। यह अहंकार ही अज्ञान और सृष्टि की विविधता का मूलकारण है।

श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, तत्त्वों की संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक

भागवत यहाँ अहंकार का वंश-वृक्ष बताता है। प्रकृति → महत्त्व → अहंकार। यानी अहंकार प्रकृति का विकार है — आत्मा का नहीं। यह समझ बहुत ज़रूरी है।

जब हम कहते हैं "मैं अहंकारी हूँ" — तो यह गलत है। सही यह है — "मेरे भीतर अहंकार है, जो प्रकृति का विकार है।" इस एक भेद को समझने से अहंकार की पकड़ ढीली होने लगती है।

६. श्रीमद्भागवत — आत्मा ज्ञानस्वरूप है — प्रकृति से उसका कोई संबंध नहीं

आत्मा ज्ञानस्वरूप है — उसका इन पदार्थों से न तो कोई संबंध है और न उसमें कोई विवाद की ही बात है।

श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, तत्त्वों की संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक

यह छोटा पर गहरा वाक्य है। "आत्मा ज्ञानस्वरूप है।" यानी आत्मा शुद्ध ज्ञान है — उसमें कोई विकार नहीं, कोई बंधन नहीं, कोई अहंकार नहीं।

तो फिर अहंकार कहाँ से आया? प्रकृति से। और जब प्रकृति की यह भ्रांति मिटती है — आत्मा अपने ज्ञानस्वरूप में प्रकट होती है। यही परमात्मा से अभिन्नता का अनुभव है।

७. श्रीमद्भागवत — ध्रुवजी — मन को भगवान् में एकाग्र करना — अहंकार का विलय

उस समय उन्होंने शब्दादि विषय और इंद्रियों के नियामक अपने मन को सब ओर से खींच लिया तथा हृदयस्थित हरि के स्वरूप का चिंतन करते हुए चित्त को किसी दूसरी ओर न जाने दिया।

श्रीमद्भागवत — चतुर्थ स्कंध, ध्रुव का वन-गमन

ध्रुवजी ने क्या किया? मन को "सब ओर से खींच लिया।" यानी इंद्रियों का आकर्षण तोड़ा — और मन को भगवान् में लगाया। यह बहुत व्यावहारिक उपाय है।

जब मन बाहर की चीज़ों में नहीं जाता — तो "मुझे यह चाहिए, वह मेरा है" — यह अहंकार कमज़ोर पड़ता है। और जब अहंकार कमज़ोर पड़ता है — हरि की उपस्थिति महसूस होने लगती है। यही अभिन्नता का अनुभव है।

जीवन में उपयोग

अहंकार को धीरे-धीरे दूर करने के लिए यह दो अभ्यास करें।

पहला — जब भी "मेरा" का भाव आए, एक पल रुकें। मन में पूछें: "यह 'मेरा' किसका है? यह 'मैं' कौन है?" इस सवाल का उत्तर मत सोचें — बस पूछें और चुप हो जाएं। उस चुप्पी में जो है, वही आत्मा है।

दूसरा — ध्रुवजी की तरह, रोज़ कुछ समय मन को बाहर से खींचें। फोन बंद करें, आँखें बंद करें, और बस एक बार भगवान् का नाम लेकर पाँच मिनट शांत बैठ जाएं। उन पाँच मिनटों में "मैं और मेरा" थोड़ा पिघलता है, और जहाँ "मैं" पिघलता है, वहाँ परमात्मा प्रकट होता है।

समग्र समझ

योगवासिष्ठ और भागवत दोनों एक ही बात को अलग-अलग तरीके से कहते हैं। योगवासिष्ठ कहता है — अहंकार चित्त की भेदवासना है, मिथ्या है, ज्ञान से शांत होता है। भागवत कहता है — अहंकार प्रकृति का विकार है, आत्मा का नहीं, भक्ति से क्षीण होता है।

और दोनों का उपाय भी मिलता-जुलता है — ज्ञान कि "मैं यह शरीर नहीं हूँ", भक्ति कि "मन को भगवान् में लगाओ", और वैराग्य कि "बाहरी चीज़ों की पकड़ ढीली करो।" जब ये तीनों साथ हों — अहंकार का खंभा टूटता है। और जब खंभा टूटता है — लहर समुद्र को पहचान लेती है।

इसी विषय पर और पढ़ें: आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को अनुभव करने के लिए कौन से साधन बताए गए हैं? तथा आत्मा और परमात्मा का स्वरूप क्या है?

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
अहंकार "मैं" का भाव — आत्मा को अलग दिखाने वाली भ्रांति Ego — illusion of being separate from the whole
भेदवासना भेद देखने की प्रवृत्ति — अलगाव की जड़ Tendency to see distinctions — root of separation
अभिन्नता आत्मा और परमात्मा का एक होना Non-duality — oneness of Atman and Paramatman
चित्त मन, अंतःकरण Mind — the inner organ of consciousness
शरणागति ईश्वर में पूर्ण समर्पण Complete surrender to God
ज्ञानस्वरूप शुद्ध ज्ञान का स्वरूप — आत्मा का वास्तविक रूप Pure knowledge — the true nature of Atman
विकार प्रकृति का परिणाम — जो आत्मा का नहीं है Modification of nature — not belonging to the Self

Sources

  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — स्थिति प्रकरण / सर्ग ११
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग १८६
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उपशम प्रकरण / सर्ग ७८
  • Shrimad Bhagwat Puran — Ekadash Skandh / तत्त्वों की संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक
  • Shrimad Bhagwat Puran — Chaturth Skandh / ध्रुव का वन-गमन
NM

Nripendra Mishra

Nripendra Mishra writes and curates content on Hindu scriptures and Vedanta philosophy for Guru's Adda, presenting the wisdom of the Bhagavad Gita, Yoga Vasistha, and other ancient texts in accessible Hindi.

Reviewed on 4 June 2026