एक बार एक विद्यार्थी ने अपने गुरु से पूछा — "गुरुजी, आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान — दोनों एक ही हैं या अलग-अलग?" गुरु चुप रहे। फिर बोले — "तुमने कभी नदी को समुद्र में मिलते देखा है? नदी जब तक नदी है, वह आत्मज्ञान है। जब समुद्र में मिलकर समुद्र हो जाती है — वह ब्रह्मज्ञान।"
यह उपमा बहुत सरल लगती है — पर जितना सोचो, उतना गहरी होती जाती है।
आत्मज्ञान यानी "मैं कौन हूँ?" का उत्तर। ब्रह्मज्ञान यानी "यह सब क्या है?" का उत्तर। एक व्यक्तिगत है, दूसरा सार्वभौमिक। एक से "मैं" की सीमा समझ आती है, दूसरे से "मैं" की सीमा ही मिट जाती है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्री योगवासिष्ठ — ब्रह्म क्या है? और अज्ञान क्या?
कर्म, कर्ता और करणों से रहित, कारण से वर्जित, सर्वविध विकारों से शून्य, स्वकीय ज्ञान से अपनी स्थिति में समर्थ — महान् आत्मा ही ब्रह्म है। उक्त स्वरूप से ज्ञात न हुआ ब्रह्म अज्ञानियों द्वारा अज्ञान शब्द से व्यवहृत होता है, और परिज्ञात हुआ अज्ञान का विनाशक ब्रह्म ही ज्ञान शब्द से कहा जाता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ११
यह बहुत ही सूक्ष्म बात है। ब्रह्म कोई नई चीज़ नहीं है जिसे "ढूँढना" है। वह पहले से है — बस जाना नहीं गया। जब जान लिया, तो ज्ञान। जब नहीं जाना, तो वही अज्ञान।
आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान का यही फर्क है — आत्मज्ञान में "मैं ब्रह्म हूँ" समझ आता है। ब्रह्मज्ञान में "मैं और ब्रह्म अलग नहीं हैं" का पूर्ण अनुभव होता है।
२. श्री योगवासिष्ठ — आत्मज्ञानी के लिए जन्म-मरण "मृगतृष्णा" जैसे
ज्ञानवान न मरण-साधनों से मरता है और न जीवन-साधनों से कुछ जीता है। असत् भी मरण-जनन अज्ञानीजनों की भ्रांति से मृगतृष्णा नदी के तटों के सदृश भ्रांत आत्मा में भासते हैं। बुद्धि आदि से लेकर सम्पूर्ण यह जगत् दृश्य जिसे स्वतः नहीं रुचता — आकाश के सदृश शांत उस पुरुष को उत्तम लोग मुक्त कहते हैं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ३८
"मृगतृष्णा नदी के तट" — यह उपमा बहुत सटीक है। रेगिस्तान में मृगतृष्णा में पानी दिखता है, तट दिखते हैं — पर हैं नहीं। आत्मज्ञानी जानता है कि जन्म-मरण, सुख-दुःख — सब ऐसे ही हैं। दिखते हैं, पर उनकी जड़ नहीं है।
यह आत्मज्ञान की सबसे बड़ी देन है — भय कम होना। जब पता हो कि मृत्यु एक भ्रम है, तो जीना निडर हो जाता है।
३. श्री योगवासिष्ठ — ब्रह्मज्ञान में दृश्य-द्रष्टा का जाल टूटता है
जिस पुरुष को यह सच्चिदानंदात्मक अखंड ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसकी दृष्टि में न तो पाँच भूत ही हैं और न उसे दृश्य-द्रष्टा का विभ्रम ही भासता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ९१
आत्मज्ञान में एक सूक्ष्म द्वंद्व बचा रहता है — "मैं जानने वाला हूँ, और ब्रह्म जानने योग्य है।" ब्रह्मज्ञान में यह द्वंद्व भी मिट जाता है। जानने वाला, जाना जाने वाला, और जानने की क्रिया — तीनों एक हो जाते हैं।
यह समझाना बहुत कठिन है — पर अनुभव करना उससे भी कठिन और उससे भी सुंदर।
४. श्री योगवासिष्ठ — वैराग्य पहला कदम — राजा अरिष्टनेमि का उदाहरण
राजा अरिष्टनेमि की स्वर्ग के प्रति विरक्ति देखकर महर्षि वाल्मीकि से कहा — महर्षिजी, इस विरक्त, विनीत और स्वर्ग के प्रति निस्पृह राजा को तत्त्वज्ञान का उपदेश दीजिये। तत्त्वज्ञान के उपदेश से संसार-दुःख से पीड़ित वह क्रमशः मुक्ति को प्राप्त होगा।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण, सर्ग १
यहाँ एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है — राजा को "स्वर्ग" से भी वैराग्य हो गया था। सोचिए — स्वर्ग से वैराग्य। हम तो अभी घर, गाड़ी, नौकरी से भी नहीं थक पाए।
पर यही वैराग्य — चाहे छोटा हो या बड़ा — आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान की पहली सीढ़ी है। जब संसार के सुखों की थोड़ी भी असारता समझ आने लगे — उसी दिन से यात्रा शुरू होती है।
५. स्कंद महापुराण — ब्रह्मज्ञान से पुनर्जन्म नहीं — साधन क्या हैं?
जो भगवान् केदार का यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसके समस्त पापों का नाश होता है। ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्य का फिर जन्म नहीं होता।
स्कंद महापुराण — नागर खंड, बदरिकाश्रम माहात्म्य, अध्याय ४०५
स्कंद पुराण यहाँ एक व्यावहारिक साधन बताता है — शास्त्र-श्रवण। "पढ़ता या सुनता है" — इतना काफी है शुरुआत के लिए। ब्रह्मज्ञान किसी गुफा में जाकर ही नहीं मिलता — शास्त्र का नियमित श्रवण भी उसी दिशा में ले जाता है।
और फल? पुनर्जन्म का चक्र टूट जाता है। यह सबसे बड़ी मुक्ति है।
६. श्रीमद्भागवत — ब्रह्मज्ञान-निष्ठा — सुख-दुःख के पार
यह भिक्षुक का गीत क्या है — मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्त से इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है, वह कभी सुख-दुःखादि द्वंद्वों के वश में नहीं होता।
श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास
यहाँ एक भिक्षुक — जो सड़क पर चलता है, भीख माँगता है — उसका गीत "मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान" कहा गया। यानी ब्रह्मज्ञान किसी महल में नहीं रहता — वह किसी भी व्यक्ति में, किसी भी अवस्था में प्रकट हो सकता है।
और साधन? सुनना, सुनाना, धारण करना। बस। यही तीन काम — और द्वंद्व पार हो जाते हैं।
७. एक अतिरिक्त दृष्टि — उपनिषद् का सार
अहं ब्रह्मास्मि।
बृहदारण्यक उपनिषद्
तीन शब्द — "मैं ब्रह्म हूँ।" आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान का पूरा सार इन तीन शब्दों में है। "अहम्" — मैं, यानी आत्मज्ञान। "ब्रह्म" — वह परम सत्ता, यानी ब्रह्मज्ञान। "अस्मि" — हूँ, यानी दोनों के बीच का भेद नहीं।
जिस दिन यह तीन शब्द केवल बौद्धिक ज्ञान न रहकर हृदय की अनुभूति बन जाएँ — उस दिन दोनों ज्ञान एक हो जाते हैं।
जीवन में उपयोग
आत्मज्ञान से ब्रह्मज्ञान की दिशा में बढ़ने के लिए यह दो अभ्यास करें।
पहला — आत्मज्ञान की शुरुआत के लिए, दिन में एक बार, जब बहुत व्यस्त हों, एक पल रुककर पूछें: "यह सब जो हो रहा है — इसे देखने वाला कौन है?" धीरे-धीरे एक "देखने वाले" की झलक मिलने लगेगी — जो न थका है, न परेशान है, न डरा है। वही आत्मा है।
दूसरा — ब्रह्मज्ञान की दिशा में, किसी भी सत्संग में जाएँ, शास्त्र सुनें, किसी संत के पास बैठें। वहाँ धीरे-धीरे यह "देखने वाला" और "दिखने वाला" एक होने लगता है। यही यात्रा है, और यही मंज़िल भी।
