मोक्ष कैसे प्राप्त होता है?
यह शायद मनुष्य का सबसे पुराना सवाल है। हज़ारों साल से लोग पूछते आए हैं — "क्या इस जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिल सकता है? और अगर मिल सकता है, तो कैसे?"
दिलचस्प बात यह है कि शास्त्रों ने इस सवाल का जवाब बहुत अलग-अलग तरीकों से दिया है — और फिर भी सब एक ही जगह पहुँचते हैं। कोई ज्ञान की बात करता है, कोई भक्ति की, कोई तपस्या की, कोई शरणागति की। पर अंत में सब कह रहे हैं — "अपने असली स्वरूप को पहचानो।"
मोक्ष कोई पुरस्कार नहीं जो बाहर से मिलता है। यह एक अनुभव है — जब यह पता चलता है कि हम जो खोज रहे थे, वह कभी गया ही नहीं था। बस ढका था।
शास्त्रों से ज्ञान
१. विवेकचूड़ामणि — अविद्या के बंधन काटना ही पहला कदम
श्रीगुरु ने कहा — तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझसे पावन हो गया है — क्योंकि तू अपने अविद्याजन्मा बंधनों को काट कर ब्रह्मस्वरूप बनना चाहता है।
विवेकचूड़ामणि — शिष्य-प्रशंसा
यहाँ गुरु शिष्य की प्रशंसा कर रहे हैं — और वे क्यों कर रहे हैं? इसलिए नहीं कि शिष्य बहुत धनवान है, या बहुत विद्वान है। बल्कि इसलिए कि उसमें "ब्रह्मस्वरूप बनने की इच्छा" जागी है।
यह इच्छा का जागना — यही मोक्ष की यात्रा का असली शुभारंभ है। जब तक यह इच्छा नहीं जागती, सब कुछ बाहरी है। और जब जाग जाती है — तो गुरु भी कहते हैं "तू धन्य है।"
२. श्रीमद्भगवद्गीता — अनन्य भक्ति, निष्काम कर्म और निर्वैर भाव
जो पुरुष केवल मेरे लिए सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है, मेरा भक्त है, मुझमें परायण है, आसक्तिरहित है तथा सभी प्राणियों के प्रति वैरभाव से रहित है — ऐसा अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझे ही प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ११, विश्वरूपदर्शन योग
भगवान् ने यहाँ मोक्ष का रास्ता बहुत साफ बताया है — पर ध्यान दीजिए, उन्होंने चार बातें एक साथ कही हैं। केवल भक्त होना काफी नहीं। केवल कर्म करना काफी नहीं। आसक्ति भी छोड़नी है। और सबसे महत्त्वपूर्ण — किसी से भी वैर नहीं।
यह "निर्वैर" वाली बात अक्सर छूट जाती है। हम भक्ति करते हैं, पर मन में कहीं न कहीं किसी के प्रति कड़वाहट बनी रहती है। जब तक यह कड़वाहट है — मोक्ष का द्वार पूरी तरह नहीं खुलता।
३. स्कंद महापुराण — श्रद्धापूर्वक श्रवण से भगवान् का सालोक्य
जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस माहात्म्य को सुनता अथवा सुनाता है, वह सब पापों से मुक्त होता है और भगवान् विष्णु का सालोक्य प्राप्त करता है।
स्कंद महापुराण — बदरिकाश्रम माहात्म्य, अध्याय १०३
"सालोक्य" — यानी भगवान् के लोक में स्थान। यह मोक्ष का एक रूप है — जहाँ भक्त और भगवान् के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
और साधन? बस "एकाग्रचित्त" होकर, "भक्तिपूर्वक" सुनना। यह बहुत सरल लगता है — पर "एकाग्रचित्त" वाली शर्त बड़ी कठिन है। जब मन पूरी तरह वहाँ हो — तभी श्रवण का फल मिलता है।
४. स्कंद महापुराण — ब्रह्मज्ञान से पुनर्जन्म नहीं
केदार क्षेत्र में जल पीकर, गया तीर्थ में पितरों को पिंड देकर तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्य का फिर जन्म नहीं होता।
स्कंद महापुराण — बदरिकाश्रम माहात्म्य, अध्याय ४०५
यह श्लोक तीन साधन एक साथ बताता है — तीर्थ, पितृ-कर्म और ब्रह्मज्ञान। और तीनों का फल एक — पुनर्जन्म नहीं।
पर इनमें सबसे गहरा साधन कौन सा है? ब्रह्मज्ञान। क्योंकि तीर्थ और पिंड बाहरी क्रियाएँ हैं — वे पुण्य देती हैं। ब्रह्मज्ञान भीतरी क्रांति है — वह अज्ञान की जड़ काटती है। और जब जड़ कटती है — तो पेड़ खुद गिर जाता है।
५. श्रीमद्भागवत — शरणागति, सत्संग और तपस्या से परमपद
मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्मा का स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्त से जपते हुए तुम महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होने पर इसी से तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जाएगा।
श्रीमद्भागवत — चतुर्थ स्कंध, प्रचेताओं को श्रीनारदजी का उपदेश
यहाँ नारदजी प्रचेताओं को एक स्तोत्र दे रहे हैं और कह रहे हैं — "इसे जपो और तपस्या करो।" यह बहुत व्यावहारिक उपदेश है। स्तोत्र — यानी भगवान् का स्मरण। तपस्या — यानी मन को एकाग्र करने की साधना।
दोनों मिलकर काम करते हैं। केवल जप से मन भटकता रहे — तो फल नहीं। केवल तपस्या से भगवान् का स्मरण न हो — तो फल नहीं। दोनों साथ हों — तो "अभीष्ट फल" अवश्य मिलता है।
६. योगवासिष्ठ — आत्मा ही कर्ता, भोक्ता, संहारक — यह जानना ही मुक्ति
यह काल ही सृष्टिकाल में संसार का कर्ता, भोक्ता, संहारक, स्मर्ता आदि सब पदार्थों के स्वरूप को प्राप्त हुआ है — अर्थात् यह स्वयं ही कर्ता, भोक्ता, संहारक, सुभग, दुर्भग आदि बना।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण, सर्ग २३
योगवासिष्ठ की यह बात सबसे गहरी है। वह कह रहा है — कर्ता भी तू है, भोक्ता भी तू है, संहारक भी तू। यह "खेल" तू ही खेल रहा है।
जब यह समझ आती है — कि मैं ही सब कुछ हूँ, मैं ही ब्रह्म हूँ — तो फिर "मुक्ति की खोज" ही बेमानी हो जाती है। क्योंकि जो खोज रहा था और जो खोजा जा रहा था — दोनों एक हो जाते हैं। यही मोक्ष है।
७. एक अतिरिक्त दृष्टि — माण्डूक्य उपनिषद् का सार
सर्वं ह्येतद् ब्रह्म। अयमात्मा ब्रह्म।
माण्डूक्य उपनिषद्
"यह सब ब्रह्म है। यह आत्मा ब्रह्म है।" — दो वाक्य, पर इनमें पूरा वेदांत है। पहला वाक्य बाहरी जगत् की बात करता है — सब ब्रह्म। दूसरा भीतरी — आत्मा ब्रह्म।
जब ये दोनों अनुभव एक हो जाएँ — बाहर भी ब्रह्म, भीतर भी ब्रह्म — तब मोक्ष के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता। वह यहीं है, अभी है।
समग्र समझ
पाँचों शास्त्र मोक्ष के अलग-अलग द्वार दिखाते हैं — पर सब एक ही महल में खुलते हैं। विवेकचूड़ामणि कहती है — अविद्या काटो। गीता कहती है — अनन्य भक्ति और निर्वैर भाव रखो। स्कंद पुराण कहता है — श्रद्धापूर्वक श्रवण और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करो। भागवत कहता है — शरणागति और तपस्या। योगवासिष्ठ कहता है — आत्मस्वरूप को पहचानो।
सबका सार एक है — "मैं" की सीमा टूटे, और "वह" की विशालता का अनुभव हो। यही मोक्ष है।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| मोक्ष | बंधनों से पूर्ण मुक्ति | Liberation from all bondage |
| अविद्या | अज्ञान जो आत्मा को ढके रहता है | Ignorance veiling the true Self |
| शरणागति | ईश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण | Complete surrender to God |
| निष्काम कर्म | फलाशा रहित कर्म | Action without desire for reward |
| सालोक्य | भगवान् के लोक में स्थान | Dwelling in God's realm — a form of liberation |
| ब्रह्मज्ञान | परम सत्य का साक्षात्कार | Realization of the Supreme Reality |
| तपस्या | मन और इंद्रियों की कठोर साधना | Austerity and intense spiritual practice |
जीवन में उपयोग
मोक्ष की साधना को जटिल मत बनाइए। आज से पाँच सरल काम करें। पहला — रोज़ थोड़ा सत्संग या शास्त्र-श्रवण। दूसरा — जो भी काम करें, मन में एक बार कहें "यह भगवान् के लिए।" तीसरा — किसी के प्रति मन में जो कड़वाहट है, उसे थोड़ा-थोड़ा छोड़ना शुरू करें। चौथा — रोज़ दस मिनट मौन में बैठें — बस देखें कि "देखने वाला कौन है।" पाँचवाँ — कुछ भी हो, भगवान् का नाम लेना न भूलें।
यह पाँच काम — अगर नियमित हों — तो धीरे-धीरे "मैं" की दीवार पतली होती जाएगी। और एक दिन जब वह दीवार गिरेगी — उस दिन जो मिलेगा, उसे शास्त्रों ने मोक्ष कहा है।
Sources
- Viveka Chudamani — शिष्य-प्रशंसा
- Shrimad Bhagavad Gita — Adhyaya 11, Vishwarupa Darshana Yoga
- Skanda Mahapurana — Vaishnava Khanda, Badrikashram Mahatmya / Chapter 103, 405
- Shrimad Bhagwat Puran — Chaturth Skandh / प्रचेताओं को श्रीनारदजी का उपदेश
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण / सर्ग २३
- Mandukya Upanishad — Mahavakya: Ayam Atma Brahma
