आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान — ये दो शब्द अक्सर लगभग पर्यायवाची की तरह इस्तेमाल होते हैं। पर शास्त्रों में गहराई से उतरने पर पता चलता है कि दोनों एक ही यात्रा के दो पड़ाव हैं — एक व्यक्तिगत खोज है, दूसरा उसका सार्वभौमिक विस्तार। आत्मज्ञान का अर्थ है अपने शुद्ध चैतन्य-स्वरूप की पहचान — "मैं कौन हूँ" का उत्तर। ब्रह्मज्ञान इससे आगे जाता है — यह जानना कि जो "मैं" हूँ, वही सब कुछ भी है।
ब्रह्म क्या है, और अज्ञान क्या
श्री योगवासिष्ठ इसे बहुत सीधे शब्दों में कहता है:
"कर्म, कर्ता और करणों से रहित, कारण से वर्जित, सर्वविध विकारों से शून्य, स्वकीय ज्ञान से अपनी स्थिति में समर्थ, महान आत्मा ही ब्रह्म है, यों ब्रह्मज्ञानी लोग कहते हैं ॥५०॥ उक्त स्वरूप से ज्ञात न हुआ ब्रह्म अज्ञानियों द्वारा अज्ञान शब्द से व्यवहृत होता है, और परिज्ञात हुआ, अज्ञान का विनाशक ब्रह्म ही ज्ञान शब्द से कहा जाता है ॥५१॥"
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग ११
यहाँ एक सूक्ष्म बात है — ब्रह्म कोई नई वस्तु नहीं है जिसे खोजना है। वह पहले से मौजूद है; बस जाना नहीं गया। आत्मज्ञान अहं के मिथ्यात्व और देह-बुद्धि की भ्रांति से बाहर निकालता है — ब्रह्मज्ञान उस अनन्यता का पूर्ण साक्षात्कार है, जिसे शास्त्र "सर्वमिदं खल्विदं ब्रह्म" कहते हैं।
आत्मज्ञानी के लिए जन्म-मरण मृगतृष्णा जैसा
योगवासिष्ठ आगे कहता है:
"ज्ञानवान न मरण-साधनों से मरता है और न जीवन-साधनों से कुछ जीता है ... विशुद्ध संवित्स्वरूप, आत्मप्रकाश सम्पन्न तथा चिदाकाशस्वरूप हुए इस महात्मा के असत् भी मरण-जनन अज्ञानीजनों की ही भ्रान्ति से मृगतृष्णा नदी के तटों के सदृश भ्रान्त आत्मा में भासते हैं ॥२८,२९॥ ... बुद्धि आदि से लेकर सम्पूर्ण यह जगत् दृश्य जिसे स्वतः नहीं रुचता, आकाश के सदृश शान्त उस पुरुष को उत्तम लोग मुक्त कहते हैं ॥३३॥"
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ३८
जो आत्मज्ञानी है, उसके लिए जन्म-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि जैसे द्वंद्व "मृगतृष्णा के तटों" जितने ही भ्रामक हैं — दिखते हैं, पर उनकी कोई ठोस जड़ नहीं। यही आत्मज्ञान की सबसे बड़ी देन है — भय का शांत हो जाना।
ब्रह्मज्ञान में दृश्य-द्रष्टा का भेद ही मिट जाता है
पर ब्रह्मज्ञान इससे भी आगे की अवस्था है:
"भद्र, जिस पुरुष को यह सच्चिदानन्दात्मक अखण्ड ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसकी दृष्टि में न तो पाँच भूत ही हैं और न उसे दृश्य-द्रष्टा का विभ्रम ही भासता है ॥४८॥"
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ९१
आत्मज्ञान में एक सूक्ष्म द्वंद्व अब भी बचा रहता है — "मैं जानने वाला हूँ, ब्रह्म जानने योग्य है।" ब्रह्मज्ञान में यह द्वंद्व भी विलीन हो जाता है — जानने वाला, जाना जाने वाला और जानने की क्रिया, तीनों एक हो जाते हैं।
साधन का प्रश्न — वैराग्य पहला कदम
पर इस अवस्था तक पहुँचा कैसे जाए? योगवासिष्ठ राजा अरिष्टनेमि के प्रसंग से इसका उत्तर देता है:
"राजा अरिष्टनेमि की स्वर्ग के प्रति विरक्ति देखकर ... महर्षि वाल्मीकि से मेरा यह सन्देशा कहो कि महर्षिजी, इस विरक्त, विनीत और स्वर्ग के प्रति निस्पृह राजा को तत्त्वज्ञान का उपदेश दीजिये — तत्त्वज्ञान के उपदेश से संसार-दुःख से पीड़ित वह क्रमशः मुक्ति को प्राप्त होगा।"
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — वैराग्य प्रकरण, सर्ग १
ध्यान देने की बात यह है कि राजा को स्वर्ग से भी वैराग्य हो गया था — हम तो अभी घर-गाड़ी-नौकरी से भी नहीं थके। पर यही वैराग्य, चाहे छोटा हो या बड़ा, आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान दोनों की पहली सीढ़ी है। स्वर्ग के सुखों से अनासक्ति, गुरु-संग, और श्रवण-मनन-निदिध्यासन — यही तत्त्वज्ञान का आधार है।
शास्त्र-श्रवण भी एक साधन है
स्कन्द महापुराण एक और सरल साधन बताता है:
"जो भगवान् केदार का यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसके समस्त पापों का नाश ... ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्य का फिर जन्म नहीं होता।"
स्कन्द महापुराण — नागर खंड, बदरिकाश्रम माहात्म्य, अध्याय ४०५
तीर्थ-सेवा, भगवत्-स्मरण या साधु-मार्ग का अनुसरण — ये ब्रह्मज्ञान तक पहुँचने के सर्वोत्तम साधनों में गिने जाते हैं। और श्रीमद्भागवत एक भिक्षुक के दृष्टांत से इसे और सरल बना देता है:
"संन्यास लेकर पृथ्वी में स्वच्छन्द विचर रहा था ... यह भिक्षुक का गीत क्या है, मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्त से इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है, वह कभी सुख-दुःखादि द्वंद्वों के वश में नहीं होता।"
श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध, एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास
यहाँ एक साधारण भिक्षुक का गीत ब्रह्मज्ञान-निष्ठा कहा गया — यानी ब्रह्मज्ञान किसी महल में नहीं, बल्कि किसी भी अवस्था में प्रकट हो सकता है। मुक्ति के लिए भक्ति, ब्रह्मज्ञान में निष्ठा, और सम्पूर्ण समर्पण ही चाहिए।
जीवन में उपयोग
आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान दोनों की दिशा में बढ़ने के लिए यह तीन अभ्यास साथ में करें।
पहला — रोज़ थोड़ा समय आत्म-निरीक्षण को दें। "मैं देह नहीं, शुद्ध चैतन्य हूँ" इसे बार-बार याद करें, विशेषकर जब मन विचलित हो।
दूसरा — सत्संग और गुरु-संग खोजें। अकेले साधना कठिन है — किसी ऐसे व्यक्ति या समूह के पास समय बिताएं जो इसी दिशा में चल रहा हो।
तीसरा — शास्त्र-स्वाध्याय और निष्काम सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं। यह दोनों — ज्ञान और कर्म — मिलकर ही ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाते हैं।
