कुछ साल पहले मैं एक छोटे से कस्बे में गया था। वहाँ एक बुज़ुर्ग थे — साधारण धोती-कुर्ता, बाज़ार में सब्ज़ी खरीदते, पड़ोसियों से हँसकर बात करते। किसी ने बताया — "ये बहुत बड़े ज्ञानी हैं।"

मैंने सोचा — "इनमें और बाकी लोगों में फर्क क्या है? सब्ज़ी तो सब खरीदते हैं।"

बाद में किसी ने एक बात कही जो मन में बैठ गई — "फर्क यह नहीं कि वे क्या करते हैं। फर्क यह है कि करते हुए उनके भीतर क्या होता है।"

यही इस पूरे प्रश्न का उत्तर है। ब्रह्मज्ञानी सामान्य जीवन जी सकता है — पर उसका "सामान्य" हमारे "सामान्य" से बिल्कुल अलग होता है।

शास्त्रों से ज्ञान

१. श्री योगवासिष्ठ — ब्रह्मज्ञानी के लिए जगत् ब्रह्मरूप ही है

जिस पुरुष को यह सच्चिदानंदात्मक अखंड ब्रह्मज्ञान उत्पन्न हो गया है, उसकी दृष्टि में न तो पाँच भूत ही हैं और न उसे दृश्य-द्रष्टा का विभ्रम ही भासता है। जब परमार्थ-दशा में यह सब कुछ दृश्य निर्विकार ब्रह्मरूप ही सिद्ध हुआ, तब ब्रह्मपद में ही रहकर मैंने अपनी आत्मा को उक्त नानाविध जगत् के रूप में देखा।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ९१

यह बात ध्यान से समझिए। ब्रह्मज्ञानी को "पाँच भूत नहीं दिखते" — इसका मतलब यह नहीं कि उसे घर-परिवार नहीं दिखता। मतलब यह है कि जो दिखता है, वह उसे ब्रह्म के रूप में दिखता है।

जैसे सोने से बना कंगन देखने पर एक ज्वेलर कहेगा "यह सोना है" — और एक आम आदमी कहेगा "यह कंगन है।" दोनों को वही दिखता है — पर देखने का तरीका अलग है। ब्रह्मज्ञानी का जीवन ऐसा ही है।

२. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञानी सब कुछ ब्रह्म में "निगल" लेता है

जैसे असत्स्वरूप उत्पन्न हुए कंगन आदि को सुवर्ण अपने में लीन कर लेता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयरूप इन तीनों को निगल जाता है। देश, काल आदि से अनवच्छिन्न केवल अद्वितीय परमात्मा ही है — सबका आत्मा होने के कारण सबसे अभिन्न है।

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग ८१

"निगल जाता है" — यह उपमा बहुत शक्तिशाली है। सोना गलने पर कंगन में बदल जाता है — पर सोने की दृष्टि से वह सोना ही रहता है। कंगन का आकार उसे बदल नहीं सकता।

ब्रह्मज्ञानी के लिए यही होता है। संसार का हर रूप — परिवार, काम, रिश्ते — सब ब्रह्म में "निगल" लिए जाते हैं। वे दिखते हैं, पर अलग नहीं लगते।

३. श्री योगवासिष्ठ — समाधि अनायास — व्यवहार भी अनायास

सम्पूर्ण भोगों से शून्य, इन्द्रियों की वृत्तियों को शांत किये हुए, एकमात्र अपनी आत्मा में ही रमण करने वाले — बिना किसी प्रयास के विश्रांति प्राप्त कर चुके योगी की समाधि अर्थतः सिद्ध हो जाती है। जब वह ब्रह्मस्वरूप हो गया तब विचार ही करने कौन चलता है?

श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ४६

"विचार ही करने कौन चलता है?" — यह वाक्य बहुत गहरा है। जब "मैं" ही नहीं रहा, तो "मैं सोचूँगा, मैं करूँगा" यह कौन कहेगा?

ब्रह्मज्ञानी का जीवन इसीलिए सहज हो जाता है। समाधि के लिए बैठना नहीं पड़ता — वह चलते-फिरते, खाते-पीते भी समाधि में होता है। और यही उसका "सामान्य जीवन" है।

४. श्रीमद्भागवत — सुदामाजी — ब्रह्मज्ञानी गृहस्थ का सबसे सुंदर उदाहरण

एक ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। वे बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शांतचित्त और जितेन्द्रिय थे। वे गृहस्थ होने पर भी किसी प्रकार का संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसी में संतुष्ट रहते थे।

श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, श्रीकृष्ण के द्वारा सुदामाजी का स्वागत

सुदामाजी की कहानी हम सबने सुनी है — गरीब ब्राह्मण, टूटी झोपड़ी, पत्नी की चिंता, चावल की पोटली लेकर कृष्ण के पास जाना। बिल्कुल सामान्य जीवन।

पर वे ब्रह्मज्ञानी थे। गरीबी ने उन्हें तोड़ा नहीं। अमीर मित्र कृष्ण ने उन्हें हीन नहीं महसूस कराया। जो मिला, उसमें संतुष्ट रहे। यही ब्रह्मज्ञान का सामान्य जीवन में रूपांतरण है — परिस्थिति वही, दृष्टि अलग।

५. श्रीमद्भागवत — सुख-दुःख दोनों चित्त का भ्रम — ज्ञानी सिंह की तरह दहाड़ता है

उद्धवजी! इस संसार में मनुष्य को कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता — यह तो उसके चित्त का भ्रममात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन और शत्रु के भेद अज्ञानकल्पित हैं। वह कभी सुख-दुःखादि द्वंद्वों के वश में नहीं होता — उनके बीच में भी वह सिंह के समान दहाड़ता रहता है।

श्रीमद्भागवत — एकादश स्कंध

"सिंह के समान दहाड़ता है" — यह उपमा बहुत सटीक है। सिंह जंगल में रहता है — जंगल उसे डराता नहीं। वह जंगल का हिस्सा है, पर जंगल उसे बदल नहीं सकता।

ब्रह्मज्ञानी ऐसे ही संसार में रहता है। संसार के सुख-दुःख, प्रशंसा-निंदा, लाभ-हानि — सब उसके आसपास होते हैं। पर वह उनसे नहीं हिलता। यही उसका "सामान्य जीवन" है — जो देखने में सामान्य है, भीतर से असामान्य।

६. स्कंद महापुराण — ब्रह्मज्ञान के बाद पुनर्जन्म नहीं — पर अभी का जीवन चलता है

ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्य का फिर जन्म नहीं होता।

स्कंद महापुराण — नागर खंड, बदरिकाश्रम-माहात्म्य, अध्याय ४०५

यह वाक्य छोटा है पर इसमें एक बड़ा संकेत है। "फिर जन्म नहीं होता" — यानी यह जन्म तो है। और जब यह जन्म है, तो जीवन भी है। और जब जीवन है, तो व्यवहार भी होगा।

ब्रह्मज्ञान "अभी के जीवन" से पलायन नहीं है — यह अभी के जीवन को एक नई दृष्टि से जीना है। इस जन्म के बाद चक्र टूटता है — पर इस जन्म में? यह पूरा जीना है।

७. एक अतिरिक्त दृष्टि — अष्टावक्र गीता का संदेश

यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः। सर्वत्र सर्वदा सर्वं ब्रह्ममात्रमवस्थितम्॥

अष्टावक्र गीता — अध्याय ७

अष्टावक्र कह रहे हैं — "मन जहाँ भी जाए, वहीं समाधि है। सर्वत्र, सर्वदा, सब कुछ ब्रह्म ही है।" यानी बाज़ार में भी समाधि, रसोई में भी समाधि, कार्यालय में भी समाधि।

यही ब्रह्मज्ञानी का सामान्य जीवन है — हर जगह ब्रह्म, हर क्षण ब्रह्म। कोई अलग "ध्यान का समय" नहीं, कोई अलग "सामान्य जीवन का समय" नहीं। सब एक।

समग्र समझ

तीनों शास्त्र मिलकर एक ही बात कहते हैं — ब्रह्मज्ञानी सामान्य जीवन जी सकता है, और जीता भी है। सुदामाजी गृहस्थ थे। शौनकादि ऋषि यज्ञ करते थे। जनक राज्य चलाते थे। ये सब "सामान्य जीवन" के उदाहरण हैं।

पर इनका "सामान्य" हमारे "सामान्य" से एक मूलभूत रूप में अलग था — इनके पास "मैं" नहीं था। कर्म था, कर्ता नहीं। जीवन था, जीने वाला नहीं। यही ब्रह्मज्ञान का सबसे बड़ा रहस्य है।

लेखक का मत

मुख्य शब्द

शब्द अर्थ Meaning
ब्रह्मज्ञान ब्रह्म का साक्षात्कार Direct Realization of Brahman
गृहस्थ संसारिक जीवन जीने वाला Householder living family life
निर्लिप्त आसक्ति-रहित Unattached, without identification
प्रारब्ध पूर्वकृत कर्म का फल Results of past actions — destiny
परिग्रह संग्रह करने की प्रवृत्ति Hoarding, accumulation of possessions
निर्विकार परिवर्तनरहित, सम Changeless, unmodified
समाधि पूर्ण आत्मस्थित अवस्था State of nondual meditative absorption

जीवन में उपयोग

आज से एक छोटा सा बदलाव करें। जब भी कोई काम करें — चाहे खाना बनाना हो, ऑफिस जाना हो, बच्चों से बात करना हो — उस काम में पूरी तरह डूब जाएँ। न भूत की सोचें, न भविष्य की। बस वह क्षण।

यही ब्रह्मज्ञानी का सामान्य जीवन है — हर काम में पूरी तरह होना, पर उससे बँधे नहीं होना। काम खत्म हुआ — वह क्षण गया। अगला क्षण नया।

यह अभ्यास करते-करते एक दिन शायद वह क्षण आए जब "मैं" और "काम" का भेद मिट जाए। और उस दिन — बाज़ार में सब्ज़ी खरीदना भी समाधि बन जाए।

Sources

  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग ४६, ९१
  • श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ८१
  • Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / सुदामाजी का स्वागत
  • Shrimad Bhagwat Puran — Ekadash Skandh / एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास
  • Skanda Mahapurana — Nagara Khanda, Badrikashram Mahatmya / Chapter 405
  • Ashtavakra Gita — Adhyaya 7