एक बार किसी ने रमण महर्षि से पूछा — "आपको ब्रह्मज्ञान हो गया, तो अब आप खाना क्यों खाते हैं? सोते क्यों हैं? बात क्यों करते हैं?" रमण महर्षि मुस्कुराए और बोले — "पंखा बंद कर दो — क्या वह तुरंत रुक जाता है?"
पंखे का स्विच बंद होने के बाद भी वह कुछ देर घूमता रहता है — प्रारब्ध की तरह। ब्रह्मज्ञान होने के बाद भी शरीर और व्यवहार चलते रहते हैं — पर भीतर से "करने वाला" कोई नहीं रहता।
यही इस प्रश्न का सार है। ब्रह्मज्ञान के बाद व्यवहार बंद नहीं होता — बस उसकी जड़ बदल जाती है। आइए शास्त्रों की रोशनी में देखते हैं।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्री योगवासिष्ठ — ब्रह्मज्ञान के बाद समाधि अनायास सिद्ध होती है
सम्पूर्ण भोगों से शून्य, इन्द्रियों की वृत्तियों को शांत किये हुए, सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों में अभिरुचि न रखने वाले, एकमात्र अपनी आत्मा में ही रमण करने वाले — बिना किसी प्रयास के विश्रांति प्राप्त कर चुके योगी की समाधि अर्थतः सिद्ध हो जाती है। उस योगी को परम वैराग्य भी अर्थतः सिद्ध हो जाता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ४६
"अनायास" — यह शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। ब्रह्मज्ञान के बाद समाधि के लिए बैठना नहीं पड़ता, वैराग्य के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता — यह सब स्वाभाविक हो जाता है। जैसे नदी को समुद्र की ओर बहने के लिए कोशिश नहीं करनी पड़ती।
पर व्यवहार बंद नहीं होता। शरीर चलता रहता है, काम होते रहते हैं — पर उनमें "मैं" नहीं होता। यही संतुलन है।
२. श्री योगवासिष्ठ — ज्ञानी के कर्म — "जबरदस्ती" करते हैं, मज़बूरी से नहीं
ब्रह्मज्ञानी और नास्तिक अपने निश्चित मार्ग से अतिरिक्त जो याग, दान आदि कर्म करते हैं, वह केवल सदाचार से लोकसंग्रहार्थ व्यवहार के लिए बिना इच्छा के — मानों जबरदस्ती करते हैं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग १७५
यह श्लोक थोड़ा अजीब लग सकता है — "जबरदस्ती करते हैं?" पर इसका अर्थ गहरा है। ज्ञानी को कर्म की कोई ज़रूरत नहीं — उसका काम हो चुका। पर समाज के लिए, लोकहित के लिए, वह कर्म करता है — बिना किसी लाभ की अपेक्षा के।
जैसे एक अमीर आदमी जो पैसों की ज़रूरत नहीं है, फिर भी काम करता है — इसलिए नहीं कि उसे पैसा चाहिए, बल्कि इसलिए कि काम होना ज़रूरी है। ज्ञानी ऐसे ही कर्म करता है।
३. श्री योगवासिष्ठ — असत् संसार, सत् के समान भासता है
चित्त की वृत्ति को बहिर्मुख कर देने पर बंध और उसको समाधि द्वारा आत्मा में लीन कर देने पर निर्वाण प्राप्त होता है। असत् संसार सत् के समान भासता है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ७९
यह एक बहुत सूक्ष्म बात है। ब्रह्मज्ञान के बाद संसार "मिथ्या है" यह जानते हुए भी — वह दिखता तो सत्य जैसा ही है। जैसे सपने से जागने के बाद भी आँखें खुलने पर जो दिखता है, वह वास्तविक लगता है।
इसीलिए ज्ञानी व्यवहार करता रहता है — क्योंकि संसार उसे दिखता है। पर अब वह जानता है कि यह ब्रह्म का ही रूप है। इसलिए व्यवहार में न घबराहट है, न उत्साह — बस सहजता है।
४. विवेकचूड़ामणि — हर तरफ ब्रह्म ही ब्रह्म — आँखों में रूप, ज्ञानी में ब्रह्म
हे वत्स! अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से शांतचित्त होकर सब अवस्थाओं में ऐसा ही देख कि यह संसार ब्रह्म-प्रतीति का ही प्रवाह है — इसलिये यह सर्वथा सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है। नेत्रयुक्त व्यक्ति को चारों ओर देखने के लिये रूप के अतिरिक्त और क्या वस्तु है? उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी की बुद्धि का विषय सत्यस्वरूप ब्रह्म से अतिरिक्त और क्या हो सकता है?
विवेकचूड़ामणि — बोधोपलब्धि
शंकराचार्य जी की यह उपमा अद्भुत है। जिसकी आँखें हैं, उसे रूप के अलावा क्या दिखेगा? वह जहाँ भी देखेगा — रूप ही दिखेगा। वैसे ही ब्रह्मज्ञानी को जहाँ भी देखे — ब्रह्म ही दिखता है।
तो फिर व्यवहार में क्या बदलता है? यही कि अब हर व्यक्ति में, हर परिस्थिति में ब्रह्म दिखता है। दुकानदार में भी, भिखारी में भी, सफलता में भी, असफलता में भी। यह दृष्टि बदलती है — काम नहीं।
५. विवेकचूड़ामणि — अद्वयानंद में तृप्त — न तृप्ति, न दुःख
असत् पदार्थों के अनुभव से न कोई तृप्ति है, न दुःख की निवृत्ति। तद्-अद्वयानंद-रस की अनुभूति से तृप्त होकर सदा आत्मनिष्ठा से सुखपूर्वक रहो। स्वयं को ही सर्वथा देखते हुए, स्वयं को अद्वय मानते हुए, स्वानंद का अनुभव करते हुए — इसी प्रकार अपना जीवन बिताओ।
विवेकचूड़ामणि — बोधोपलब्धि
यह श्लोक जीवन जीने का सबसे सरल सूत्र देता है — "स्वानंद का अनुभव करते हुए जीवन बिताओ।" न किसी से लड़ो, न किसी से डरो। बस अपने आनंद में रहो और जीवन चलाते रहो।
और यह आनंद बाहर से नहीं आता — भीतर से है। इसीलिए बाहर कुछ भी हो — यह आनंद खंडित नहीं होता। यही ब्रह्मज्ञान के बाद का व्यवहारिक संतुलन है।
६. स्कंद महापुराण — शौनकादि ऋषि — ज्ञान के बाद भी धर्म, संयम, करुणा
नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि ऋषि अष्टांगयोग के साधन में तत्पर होकर एकमात्र ब्रह्मज्ञान के साधन में संलग्न थे। वे ब्रह्मवादी, धर्मज्ञ, किसी के दोष न देखने वाले, सत्यव्रती, इन्द्रियसंयमी, क्रोध को जीतने वाले तथा सब प्राणियों के प्रति दया रखने वाले थे।
स्कंद महापुराण — अयोध्या-माहात्म्य, अध्याय १५२
शौनकादि ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे — फिर भी उनके जीवन में धर्म था, सत्य था, संयम था, करुणा थी। ब्रह्मज्ञान के बाद ये गुण नहीं जाते — बल्कि और गहरे हो जाते हैं।
"किसी के दोष न देखने वाले" — यह एक बहुत ही व्यावहारिक लक्षण है। जब हर तरफ ब्रह्म दिखे, तो दोष कहाँ दिखेगा? यही ब्रह्मज्ञान का व्यवहार में रूपांतरण है।
७. स्कंद महापुराण — हरिकेश — चलते, खाते, सोते — सब में शिव
उसके हाथ केवल शिवजी की सेवा करने को ही उत्सुक रहते थे और वह मन से उनके सिवा दूसरी किसी वस्तु का चिंतन नहीं करता था। चलता, गाते, सोते, खड़े होते, लेटते, खाते और पीते हुए भी वह सब ओर भगवान् शंकर को ही देखता था।
स्कंद महापुराण — काशी खंड, अध्याय २३५
हरिकेश का यह वर्णन ब्रह्मज्ञान के बाद के व्यवहार का सबसे सुंदर चित्र है। वह सब कुछ करता था — चलना, खाना, सोना — पर हर क्रिया में शिव थे। बाहर से वह आम आदमी जैसा था। भीतर से? वह हर पल शिव में था।
यही संतुलन है — बाहर सामान्य, भीतर असामान्य। और यह "भीतर" इतना गहरा हो जाता है कि बाहर की कोई भी परिस्थिति उसे हिला नहीं सकती।
समग्र समझ
योगवासिष्ठ, विवेकचूड़ामणि और स्कंद पुराण तीनों एक ही बात कहते हैं — ब्रह्मज्ञान के बाद व्यवहार बंद नहीं होता, बदल जाता है। कर्म होते हैं — पर करने वाला नहीं रहता। संसार दिखता है — पर बाँधता नहीं। दुःख आता है — पर डुबाता नहीं।
रमण महर्षि का वह पंखे वाला उदाहरण यहाँ फिर याद आता है। स्विच बंद हो गया — पर पंखा घूमता रहेगा, जब तक प्रारब्ध है। और जब घूम रहा है, तो हवा भी देता रहेगा — लोकसंग्रह भी होता रहेगा। यही ब्रह्मज्ञान के बाद का जीवन है।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| ब्रह्मज्ञान | परमसत्य का अनुभवजन्य बोध | Experiential realization of Supreme Reality |
| समाधि | चित्त की पूर्ण संयमित स्थिति | State of perfect absorption in the Self |
| लोकसंग्रह | लोकहित के लिए कर्म | Action for the welfare of society |
| आत्मनिष्ठ | आत्मा में निरंतर स्थित | Steadfast and absorbed in the Self |
| वैराग्य | आसक्ति का स्वाभाविक निरसन | Natural detachment from sense-objects |
| प्रारब्ध | पूर्वकर्मों का फल जो भोगना ही है | Destiny — past karma that must be experienced |
| अद्वयानंद | अद्वैत ब्रह्म का आनंद | Bliss of nondual Brahman-realization |
जीवन में उपयोग
ब्रह्मज्ञान न हो — पर उसकी दिशा में चलना तो शुरू किया जा सकता है। आज से एक अभ्यास करें — जब कोई काम करें, तो बीच-बीच में एक पल रुककर पूछें: "यह काम मैं कर रहा हूँ, या हो रहा है?" यह सवाल अजीब लगेगा पहले — पर धीरे-धीरे "करने वाले" की पकड़ ढीली होने लगेगी।
और जब कोई बात बहुत परेशान करे — तो हरिकेश की तरह एक पल के लिए सोचें: "इस परिस्थिति में भी ब्रह्म है।" यह तुरंत शांत नहीं करेगा — पर धीरे-धीरे दृष्टि बदलने लगेगी। और दृष्टि बदले, तो जीवन बदल जाता है।
Sources
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग ४६, ७९, १७५
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — स्थिति प्रकरण / सर्ग १४
- Viveka Chudamani — बोधोपलब्धि
- Skanda Mahapurana — Vaishnava Khanda, Ayodhya Mahatmya / Chapter 152
- Skanda Mahapurana — Kashi Khanda, Utkalakhanda / Chapter 235
