यह सवाल मुझे हमेशा दिलचस्प लगता है — और थोड़ा मज़ेदार भी। क्योंकि जब भी कोई आध्यात्मिक मार्ग पर चलना शुरू करता है, कहीं न कहीं यह आकर्षण रहता है — "एक दिन ऐसा होगा जब कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। बस मैं और परमात्मा।"
पर शास्त्र इस रोमांटिक कल्पना को बड़े शांत तरीके से तोड़ते हैं। वे कहते हैं — ब्रह्मज्ञान होने के बाद जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं। बस उनसे "मेरापन" समाप्त हो जाता है।
और यही सबसे बड़ा फर्क है।
शास्त्रों से ज्ञान
१. श्री योगवासिष्ठ — जब तक शरीर है, कर्म चलते रहेंगे
जब तक यह शरीर खड़ा है, तब तक कर्मों का त्याग नहीं हो सकता। अपना कर्म मूल वासनात्मक मन से संबंधित है — उसका उच्छेद जब तक यह शरीर है, तब तक ज्ञान के बिना हो नहीं सकता।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ३
यह एक बहुत व्यावहारिक बात है। योगवासिष्ठ कह रहा है — जब तक शरीर है, कर्म होते रहेंगे। कोई रास्ता नहीं है इससे बचने का। साँस लेना भी कर्म है, खाना भी कर्म है।
तो ब्रह्मज्ञानी का क्या होता है? वह कर्म करता है — पर "मैं कर रहा हूँ" का भाव नहीं रहता। जैसे पंखा बंद होने के बाद भी घूमता रहता है — प्रारब्ध के कारण। ब्रह्मज्ञानी की सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी ऐसे ही चलती रहती हैं।
२. श्री योगवासिष्ठ — बिना संकल्प के पैर चलते हैं — ऐसे ही ज्ञानी के कर्म
अपने गंतव्यस्थान की ओर जाने के लिए अविच्छिन्न चित्तवृत्तिधारा से युक्त पथिक के पैर में जैसे बिना संकल्प के ही स्पंदन प्रतिक्षण होते रहते हैं — वैसे ही योगी के भी पूर्वजन्म में किये गये अभ्यासरूपी अदृष्ट के वश से ही अनिषिद्ध अपने कर्मों में स्पंदन होता रहेगा।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध, सर्ग १२६
यह उपमा बहुत सुंदर है। जब आप किसी परिचित रास्ते पर चलते हैं — ध्यान कहीं और होता है, पैर अपने आप चलते रहते हैं। कोई "संकल्प" नहीं करते — बाएँ मुड़ो, अब सीधे जाओ। बस चलते जाते हैं।
ब्रह्मज्ञानी के कर्म ऐसे ही होते हैं। घर के बच्चों की देखभाल, समाज की सेवा — सब होती रहती है। पर पीछे कोई "मैं" नहीं होता जो सोचे "यह मेरी ज़िम्मेदारी है।"
३. श्री योगवासिष्ठ — ब्रह्मज्ञानी के लिए सब ब्रह्मरूप — "संसार" केवल अज्ञानियों के लिए
ब्रह्मज्ञानी के पक्ष में यह सब कुछ ब्रह्मरूप ही स्थित है। संसार का नाम तो केवल अज्ञानियों के लिए है।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ६४
यह एक क्रांतिकारी बात है। हम "संसार" और "परमात्मा" को दो अलग चीज़ें मानते हैं — और यही हमारी समस्या है। ब्रह्मज्ञानी के लिए यह भेद ही नहीं रहता।
तो फिर उसके लिए "सामाजिक जिम्मेदारी" और "आध्यात्मिक कर्तव्य" — दोनों एक ही हो जाते हैं। पड़ोसी की मदद करना भी ब्रह्म की सेवा है। बच्चों को पढ़ाना भी ब्रह्म का कार्य है। कोई अलगाव नहीं।
४. श्री योगवासिष्ठ — पुत्र के जीवन-मरण से न हर्ष, न शोक
जिस महामति की दृष्टि में सारा विश्व चिदाकाशरूप तथा शून्यात्मक है — ऐसे तत्त्वज्ञ को किस निमित्त से किसकी इच्छा उत्पन्न होगी? पुत्र आदि के मरण-जीवन से उसको हर्ष या शोक नहीं होता। उसे यह संसार नहीं रुचता — उसे उत्तम लोग मुक्त कहते हैं।
श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध, सर्ग ३८
यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है — "पुत्र के मरण से शोक नहीं?" तो क्या ब्रह्मज्ञानी बेरहम हो जाता है?
नहीं। वह करुणावान होता है — पर दुखी नहीं। जैसे एक डॉक्टर मरीज़ की पूरी देखभाल करता है — पर अगर मरीज़ नहीं बचता, तो डूब नहीं जाता। वह जानता है कि यह जीवन और मृत्यु उससे बड़ी चीज़ें हैं। ब्रह्मज्ञानी भी ऐसे ही जिम्मेदारियाँ निभाता है — पूरे दिल से, पर बँधे हुए मन से नहीं।
५. श्रीमद्भागवत — सुदामाजी — ब्रह्मज्ञानी गृहस्थ का आदर्श
वे गृहस्थ होने पर भी किसी प्रकार का संग्रह-परिग्रह न रखकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसी में संतुष्ट रहते थे।
श्रीमद्भागवत — दशम स्कंध, श्रीकृष्ण के द्वारा सुदामाजी का स्वागत
सुदामाजी — जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण के साथ गुरुकुल में शिक्षा मिली थी — वे ब्रह्मज्ञानी थे। और फिर भी गृहस्थ थे। पत्नी थी, बच्चे थे, गरीबी थी।
उन्होंने गृहस्थी नहीं छोड़ी — पर उसमें आसक्ति भी नहीं थी। जो मिला, उसी में संतुष्ट। यह आलस्य नहीं था — यह परम संतोष था। यही ब्रह्मज्ञानी का सामाजिक जीवन है।
६. श्रीमद्भागवत — ब्रह्मज्ञानी का अपमान — समाज खुद कमज़ोर हो जाता है
ब्रह्माजी ने कहा — तुमलोगों ने ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मण का सत्कार नहीं किया। तुम्हारी उसी अनीति का यह फल है — तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओं के सामने नीचा देखना पड़ा।
श्रीमद्भागवत — षष्ठ स्कंध, बृहस्पतिजी के द्वारा देवताओं का त्याग
यह श्लोक एक अलग कोण से बात कहता है। ब्रह्मज्ञानी भले ही सामाजिक बंधनों से मुक्त हो — पर समाज उनके बिना कमज़ोर पड़ जाता है। देवताओं ने बृहस्पति का अपमान किया — और हार गए।
यानी ब्रह्मज्ञानी की समाज में उपस्थिति — चाहे वे कुछ करें या न करें — एक ऊर्जा है, एक संतुलन है। वे जब तक हैं, समाज का एक अदृश्य स्तंभ होते हैं।
७. स्कंद महापुराण — ब्रह्मज्ञानी ने राजा का धन ठुकराया — पर ज्ञान दिया
राजन्! ये गाएँ, यह सोने का भार और यह रथ — सब तुम्हारे ही पास रहें। मैं तो बहुत कल्पों तक जीवित रहने वाला हूँ। जिसका संसार में वैराग्य हो और जिसके पुण्य-पापरूप प्रारब्ध का विनाश हो जाय — वही ज्ञान के उपदेश का भागी है।
स्कंद महापुराण — ब्रह्म खंड, सेतु-माहात्म्य, अध्याय १६२
यह बहुत कमाल का प्रसंग है। ब्रह्मज्ञानी ने राजा का सारा धन लेने से मना कर दिया — पर ज्ञान देने से नहीं। यही उनकी "सामाजिक जिम्मेदारी" थी।
वे समाज से कट नहीं गए — बस उनका योगदान अलग था। धन इकट्ठा करना नहीं — ज्ञान बाँटना। यह भी एक सामाजिक ज़िम्मेदारी है — और शायद सबसे बड़ी।
समग्र समझ
तीनों शास्त्र एक ही निष्कर्ष पर आते हैं — ब्रह्मज्ञानी की सामाजिक जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं। वे बदल जाती हैं। "मेरा परिवार, मेरा समाज, मेरी जिम्मेदारी" — यह भाव जाता है। और उसकी जगह आती है एक सहज, निष्काम सेवा — जिसमें "मैं" नहीं, केवल कर्म है।
सुदामाजी ने गृहस्थी नहीं छोड़ी। ऋषियों ने यज्ञ नहीं छोड़े। ब्रह्मज्ञानी ने ज्ञान देना नहीं छोड़ा। सबने अपनी-अपनी भूमिका निभाई — पर बिना "मेरापन" के। यही संतुलन है।
लेखक का मत
मुख्य शब्द
| शब्द | अर्थ | Meaning |
|---|---|---|
| ब्रह्मज्ञानी | ब्रह्म को जानने वाला | Realized knower of Brahman |
| कर्तापन | करने का भाव, doership | Sense of being the doer |
| प्रारब्ध | पूर्व संचित कर्म का फल | Destiny — result of past actions |
| संकल्प | इच्छा, मन की प्रवृत्ति | Intention, volition of the mind |
| निर्लिप्त | आसक्ति विहीन | Unattached, untouched by outcomes |
| सहजता | स्वाभाविकता, बिना प्रयास के | Naturalness, spontaneity |
| परिग्रह | संग्रह, जमा करना | Accumulation, hoarding |
जीवन में उपयोग
अगले एक हफ्ते एक प्रयोग करें। जो भी जिम्मेदारी निभाएँ — चाहे घर की हो, ऑफिस की हो, या समाज की — उसे शुरू करने से पहले एक पल मन में कहें: "यह मैं नहीं कर रहा — यह हो रहा है।" और काम खत्म होने पर उसका श्रेय किसी को मत दें — न खुद को, न किसी और को।
यह अभ्यास शुरू में अजीब लगेगा। पर धीरे-धीरे "कर्तापन" हल्का होने लगेगा। और जब कर्तापन हल्का होता है — तो जिम्मेदारियाँ बोझ नहीं लगतीं। वे बस होती हैं — जैसे साँस होती है।
Sources
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध / सर्ग ३, ३८, ६४
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध / सर्ग १२६
- श्री योगवासिष्ठ महारामायण — उत्पत्ति प्रकरण / सर्ग ८१
- Shrimad Bhagwat Puran — Dasham Skandh / सुदामाजी का स्वागत
- Shrimad Bhagwat Puran — Shashth Skandh / बृहस्पतिजी के द्वारा देवताओं का त्याग
- Skanda Mahapurana — Brahma Khanda, Setu Mahatmya / Chapter 162
