Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 11, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 11, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
भविष्यति महासत्त्वो ज्ञातलोकपरावरः ।
सुखदुःखदशाहीनः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मनन आदि से उत्पन्न ज्ञान की दृढ़तारूप बल से युक्त
श्रीरामचन्द्रजी को लोक में कार्यतत्त्व और कारणतत्त्व का ज्ञान हो जायेगा अथवा लोगों के परम पुरुषार्थ
और संसार-भ्रमण का भी विवेक से ज्ञान हो जायेगा अथवा लोकात्मक विराट्, अव्याकृत और
हिरण्यगर्भ - ये परमार्थतः ब्रह्म ही हैं, उससे पृथक् नहीं हैं, यह ज्ञान हो जायेगा | तदुपरान्त उन्हें सुख,
दुःख आदि नहीं होंगे और सुवर्ण और मिट्टी के ढेले में कुछ भी अन्तर प्रतीत नहीं होगा