Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 12, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 12, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
आ ज्ञातं बहुकालेन व्यर्थमेव वयं वने ।
मोहे निपतिता मुग्धाः श्वभ्रे मुग्धा मृगा इव ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अरण्य
में किसी गड्ढे मेँ गिरे हुए मूढ मृग बहुत काल के बाद यह जानते हैं कि हम गड्ढे के अन्दर गिर गये हैं,
वैसे ही हम लोगों ने बहुत काल के बाद यह जाना कि हम व्यर्थ मोह में गिरे हुए हैं