Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
वचोरचितनीहारा काञ्चनोपवनोज्ज्वला ।
नूनं विकासमायाति चिन्ताचणकमञ्जरी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्-तत् आर्त वचन द्वारा रचित अश्रुरूप नीहार (ओस) कणों से युक्त और
समीपस्थ सुवर्णं आदि की अभिलाषा द्वारा पाण्डुता का सम्पादन करने से उज्जवल चिन्तारूप चने की
मंजरी अर्थात् तृष्णा पूर्णरूप से विकसित हो रही हे । तात्पर्य यह है कि नीहार से ही (तुषार से ही) चने
के पौधे बढते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए जैसे रात्रिरचित नीहार के कणों से युक्त चने के पौधे की
मंजरियाँ समीपस्थ धतूरे के बन से उज्जवल (शोभित) होकर विकसित होती हैं, वैसे ही अनेक तरह
के दुःख-विलापों से जनित अश्रुविन्दुओं से युक्त ओर समीपस्थ सुवर्णं आदि की अभिलाषा द्वारा
उज्जवल मेरी तृष्णा मानों विकसित हो रही है