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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 17, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 17, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अलमन्तर्भ्रमायैव तृष्णातरलिताशया । आयाता विषमोल्लासमूर्मिरम्बुनिधाविव ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मध्य भाग को चंचल करनेवाली तरंग समुद्र में केवल भ्रमण करने के लिए ही विषम ऊर्ध्व नाट्य को प्राप्त होती है, वैसे ही चित्त को क्षुब्ध करनेवाली तृष्णा ने केवल अंतःकरण में निविड भ्रम पैदा करने के लिए ही अनेक कष्टों से पूर्ण धनोपार्जन के लिए उत्साह प्राप्त कराया है