Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
इषुप्रपातमात्रं हि सुखदं दुःखभासुरम् ।
दाहपोषप्रदं नित्यं यौवनं मे न रोचते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्यंचा से छोड़ा गया बाण जितने समय में लक्ष्य का वेध करता हे, केवल उतने समय तक
सुखदायक, शेष सम्पूर्णं काल में दुःख देनेवाला और नित्य सन्तापरूपी दोष देनेवाला यौवन मुझे अच्छा
नहीं लगता