Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
झटित्येव प्रयात्येव शरीराद्युवताखगः ।
क्षणेनैवाल्पभाग्यस्य हस्ताच्चिन्तामणिर्यथा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अभागे पुरुष के हाथ से चिन्तामणि (अभीष्ट पदार्थ देनेवाला रत्न) तत्काल चला जाता हे,
वैसे ही शरीर से युवावस्थारूपी पक्षी जल्दी भाग खड़ा होता है