Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verses 43–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 43,44
संस्कृत श्लोक
कल्पकेलिविलासेन पिष्टपातितजन्तुना ।
अभावो भावभासेन रमते स्वात्मनात्मनि ॥ ४३ ॥
कर्ता भोक्ताथ संहर्ता स्मर्ता सर्वपदं गतः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे