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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

सकलमप्यकलाकलितान्तरं सुभगदुर्भगरूपधरं वपुः । प्रकटयन्सहसैव च गोपयन् विलसतीह हि कालबलं नृषु ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

बुद्धिकौशल से इस काल के रहस्य का किसीने निश्चय नहीं कर पाया है, पुण्य फल के उपभोग के अनुकूल सुन्दर रूप और पाप फल के भोग के अनुरूप कुरूप को धारण करनेवाले सम्पूर्ण शरीरो की सहसा सृष्टि, रक्षा ओर संहार करता हुआ यह प्रदीप्त हो रहा है । इस संसार के सम्पूर्ण जीवों में काल सबसे अधिक बलवान्‌ है