Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 25, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
क्रियामात्रादृते यस्य स्वपरिस्पन्दरूपिणः ।
नान्यदालक्ष्यते रूपं न कर्म न समीहितम् ॥ २ ॥
तेनेयमखिला भूतसंततिः परिपेलवा ।
तापेन हिममालेव नीता विधुरतां भृशम् ॥ ३ ॥
यदिदं दृश्यते किंचिज्जगदाभोगि मण्डलम् ।
तत्तस्य नर्तनागारमिहासावतिनृत्यति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सूचीकटाह न्याय से पहले दूसरे का वर्णन करते हैं।
मुनिश्रेष्ठ, स्वकर्मरूपी जिसका फलसिद्धि के अतिरिक्त न कोई दूसरा रूप देखा जाता है, न कर्म
देखा जाता है और न कोई अभिलाषा देखी जाता है, उसीने, जैसे सूर्य का प्रखर ताप बरफ को पिघला
कर नष्ट कर देता है, वैसे ही सुकुमार इन सम्पूर्ण प्राणियों को सर्वथा नष्ट कर दिया है। भाव यह है कि
सभी अनर्थो की जड़ अपना कर्म ही है। जो यह विस्तीर्ण संसाररुपी मण्डल दिखाई दे रहा है, वह उस
काल की नृत्यशाला है, वह इसमें खूब जी भर कर नृत्य करता हे