Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 25, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तृतीयं च कृतान्तेति नाम बिभ्रत्सुदारुणम् ।
कापालिकवपुर्मत्तं दैवं जगति नृत्यति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त दो कालो में से प्रथम केवल शास्त्र से ही जाना जा सकता है, उस पर विश्वास दढ करने के
लिए उसका विस्तार से वर्णन करते हैं।
यह देव पूर्वोक्त महाकाल की अपेक्षा तीसरा है। यह बड़ा उन्मत्त है, कृतान्त इस अतिभीषण नाम
को धारण कर नरमुण्डधारी वेष में संसार में नृत्य करता हे । मुनिजी, इस संसार में नृत्य कर रहे इस
कृतान्त का नियतिरूप प्रिय भार्या में अत्यन्त अनुराग है