Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 16–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verses 16–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 16-25
संस्कृत श्लोक
जगाम तत्र यत्रासौ विश्वामित्रो महामुनिः ।
ददर्श मुनिशार्दूलं द्वारभूमाववस्थितम् ॥ १६ ॥
केनापि कारणेनोर्वीतलमर्कमुपागतम् ।
ब्राह्मेण तेजसाक्रान्तं क्षात्रेण च महौजसा ॥ १७ ॥
जराजरठया नित्यं तपःप्रसररूक्षया ।
जटावल्या वृतस्कन्धं ससंध्याभ्रमिवाचलम् ॥ १८ ॥
उपशान्तं च कान्तं च दीप्तमप्रतिघाति च ।
निभृतं चोर्जिताकारं दधानं भास्वरं वपुः ॥ १९ ॥
पेशलेनातिभीमेन प्रसन्नेनाकुलेन च ।
गम्भीरेणातिपूर्णेन तेजसा रञ्जितप्रभम् ॥ २० ॥
अनन्तजीवितदशासखीमेकामनिन्दिताम् ।
धारयन्तं करे श्लक्ष्णां कुण्डीमम्लानमानसम् ॥ २१ ॥
करुणाक्रान्तचेतत्तवात्प्रसन्नैर्मधुराक्षरैः ।
वीक्षणैरमृतेनेव संसिञ्चन्तमिमाः प्रजाः ॥ २२ ॥
युक्तयज्ञोपवीताङ्ग धवलप्रोन्नतस्रुवम् ।
अनन्तं विस्मयं चान्तः प्रयच्छन्तमिवेक्षितुः ॥ २३ ॥
सुनिमालोक्य भूपालो दूरादेवानताकृतिः ।
प्रणनाम गलन्मौलिमणिमानितभूतलम् ॥ २४ ॥
मुनिरप्यवनीनाथं भास्वानिव शतक्रतुम् ।
तत्राभिवादयांचक्रे मधुरोदारया गिरा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
विश्वामित्रजी ब्रह्मवर्चस् से ओर क्षात्र
तेज से सुसंपन्न थे । उनके दर्शन से ज्ञात होता था कि किसी निमित्त से मानों सूर्यदेव ही पृथिवी पर आ
गये हों । बुढ़ापे के कारण सफेद और अधिक तप करने से सक्ष जटाओं से उनके कन्धे ढके थे । अतएव
वे सन्ध्याकाल के अरुण प्रभा से रंजित सफेद मेघ से आच्छादित पर्वत के समान प्रतीत होते थे उनका
शरीर सौम्य, सुन्दर, दैदीप्यमान (अधिक तेजस्वी होने के कारण जिस पर दृष्टि सहसा नहीं ठहर
सकती), प्रभावशाली, विनय से सम्पन्न, हृष्टपुष्ट हाथ, पैर आदि अवयवो से युक्त ओर कान्तिमान्
था। उनके तेज से नेत्र ओर मन प्रसन्न होते थे, उससे भय का भी संचार होता था, वह प्रसाद गुण से
युक्त था, अधिक होने के कारण शरीर से छलक रहा था ओर गम्भीर तथा अपरिच्छिन्न था । उक्त
प्रसन्न-गम्भीर तेज से ऋषि की कान्ति अनुरंजित थी। उनके हाथ में चिरकाल से परिगृहित एक सुन्दर
और चिकना कमण्डलु था । उनका चित्त स्निग्ध ओर प्रसन्न था । उनका हृदय दया से परिपूर्ण था,
इसलिए भाषण आदि भी सुमधुर था ओर प्रसन्न दृष्टिपात अमृततुल्य था । वे जिधर दृष्टि डालते थे,
उस तरफ के लोगों को मानों अमृत के रस से सींचते थे। उनके कन्धे में अवस्था के अनुरूप यज्ञोपवीत
थे। उनकी भौंहें सफेद और ऊँची थीं । दर्शकों के हृदय में अत्यन्त आश्चर्य का संचार कर रहे मुनिवर
को देखकर राजा ने दूर से ही नम्र होकर उन्हे प्रणाम किया । नमने से राजा के मुकुट से मणियाँ पृथिवी
पर बिखर गई | जैसे सूर्य इन्द्र का प्रत्यभिवादन करते हैं, वैसे ही विश्वामित्रजी ने भी मधुर ओर उदार
वाणी द्वारा आशीर्वाद देकर राजा का प्रत्यभिवादन किया