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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मलोकनिवासो हि कस्य न प्रीतिमावहेत् । मुने तवागमस्तद्वत्सत्यमेव ब्रवीमि ते ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिवर, ब्रह्मलोक में रहना किसको प्रीतिकर न होगा ? वैसे ही प्रीतिकर आपका आगमन है अर्थात्‌ जैसे ब्रह्मलोक में निवास करने की सबको स्पृहा रहती है, वैसे ही आपके आगमन की सभी को स्पृहा रहती हे, मैं यह निश्छल सत्य आपसे कहता हूँ