Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verses 44–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
कश्च ते परमः कामः किं च ते करवाण्यहम् ।
पात्रभूतोऽसि मे विप्र प्राप्तः परमधार्मिकः ॥ ४४ ॥
पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभः ।
ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि भगवन्मया ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, आप
परम धार्मिक हैं, आपकी क्या अभिलाषा है ? मैं आपकी क्या सेवा करूँ ? ब्रह्मन् आप सत्पात्र हैँ मेरे
भाग्य से यहाँ आये हैँ । भगवन्, आप पहले राजर्षि शब्द से अभिहित होते थे, इस समय तपस्या से
ब्रह्मर्षित्व को प्राप्त हुए परमवर्चस्वी आप मेरे परम पूज्य हैं