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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 6, Verse 46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 6, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

गङ्गाजलाभिषेकेण यथा प्रीतिर्भवेन्मम । तथा त्वद्दर्शनात्प्रीतिरन्तः शीतयतीव माम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे गंगाजल के स्नान से मुझे प्रसन्नता होती है, वैसे ही आपके दर्शन से प्रसन्नता हुई हे । उक्त प्रसन्नता मेरे हृदय को शीतल कर रही है