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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 7, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 7, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

तेषां न चान्यः काकुत्स्थाद्योद्धुमुत्सहते पुमान् । ऋते केसरिणः क्रुद्धान्मत्तानां करिणामिव ॥ १६ ॥ वीर्योत्सिक्ता हि ते पापाः कालकूटोपमा रणे । खरदूषणयोर्भृत्याः कृतान्ताः कुपिता इव ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे करुद्ध सिंह के सिवा दूसरा कोई जीव मत्त हाथियों से नहीं लड़ सकता, वैसे ही श्रीरामजी के सिवा दूसरा पुरुष उनसे नहीं लड सकता । एक तो राक्षस ही बल से गर्वित, अत्यन्त पापी, युद्ध में कालक्ूटसे भी अधिक तीव्र, कुपित यम के समान अति दारुण हैं, उस पर फिर वे हैं खर दूषण के सेवक