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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

तस्मात्प्रसादं धर्मज्ञ कुरु त्वं मम पुत्रके । मम चैवाल्पभाग्यस्य भवान्हि परदैवतम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए हे धर्मज्ञ, अनुकम्पनीय मेरे पुत्र पर अनुग्रह किजिये ओर प्रार्थी के मनोरथ को पूर्ण न कर सकने के कारण अल्प भाग्यवाले मुझपर भी अनुग्रह कीजिये । आप हमारे परम देव हैं