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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 8, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 8, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अथवा लवणं ब्रह्मन्यज्ञघ्नं तं मधोः सुतम् । कथयत्वसुरप्रख्यं नैव मोक्ष्यामि पुत्रकम् ॥ ३५ ॥ सुन्दोपसुन्दयोश्चैव पुत्रौ वैवस्वतोपमौ । यज्ञविघ्नकरौ ब्रूहि न ते दास्यामि पुत्रकम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस समय मान्धाता आदि राजाओं ने जन्म लिया था, यह काल वैसा नहीं है । इस समय में सज्जन ही निर्बल हैं। इस समय यह रघुवंशीय बालक (मैं) बुढ़ापे से शिथिल हो गया है अथवा श्रीरामचन्द्र बूढ़ों की भाँति शिथिल है ॥ ३ ४॥ अथवा यदि आपके यज्ञ में विघ्न करनेवाला असुरश्रेष्ठ मधुपुत्र लवण है, तो भी मैं अपने बेटे को नहीं जाने दूँगा